श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने शनिवार को विजया दशमी पर्व पर अपने उद्बोधन में फरमाया कि विजयादशमी विजय का प्रतीक है। दस इन्द्रियों पर विजय का पर्व है जो असत्य पर सत्य, बर्हिमुखी से अंतरमुखी, अन्याय पर न्याय, दुराचार से सदाचार, तमोगुण से सतोगुण, भोग से योग की ओर बढने का, दुष्कर्मों पर सत्कर्मों के विजय का पर्व है।
उन्होंने आगे फरमाया कि राम आज्ञाकारी थे, पितृनिष्ठा थी। एक तरफ राम को राज्य तिलक होना था, किंतु सूर्योदय से पहले ही पिता का आदेश हो जाता है कि चौदह साल वनवास जाना पड़ेगा जिसे राम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। राम ने इसे सकारात्मक दृष्टि से सोचा कि यहां राज्य में रहूंगा तो ऋषि मुनियों से मिलना नहीं होगा, वन में जाऊंगा ऋषि मुनियों, संतो से मिलना होगा और वे खुशी-खुशी वनवास को स्वीकार कर लेते हैं। दशरथ जैसी वचनबद्धता दशरथ ने किसी समय कैकेयी को वरदान दिया था कि कैकेई उसे पूरा करने के लिए वर मांगे राम को चौदह वर्ष वनवास और भरत को राज्य। दशरथ नहीं भी चाहता था किंतु उन्होंने अपने वचनों को निभाया।
सीता जैसा समर्पण सीता महलों में रह सकती थी किंतु जहां पति रहेंगे वहां मैं रहूंगी उसके समर्पण की भावना देखने को मिलती है। लक्ष्मण जैसा भाई के प्रति प्रेम। हनुमान जैसी भक्ति। भरत जैसी निस्पृहता राज्य के प्रति कोई आसक्ति नहीं, राम के खड़ाऊ को राजसिंहासन पर रखकर उनका स्पर्श करके राज्य चलाते है। जटायु जैसा बलिदान रावण सीता को ले जा रहा था जटायु पक्षी ने युद्ध किया कि तुम अन्याय कर रहे हो उसने भी अपना बलिदान दे दिया। शबरी जैसी सरलता उसने सोच लिया कि राम आंएगे तो उनका कैसे सत्कार करूं। जंगल में रात्रि को कांटो को हटाकर रास्ता साफ करती। जंगल में बेर चुन-चुन कर मीठे है वह रख लेती है खट्टे अलग कर लेती है। झौंपड़ी में राम आते हैं चटाई पर बिठाकर बेर देती है राम भी स्वीकार कर लेते हैं। विभीषण जैसा सत्यपक्षी जिसने सत्य का साथ दिया। और रावण जैसा नियमनिष्ठ जो सीता को अशोक वाटिका में रखा और सीता की सहमति के बिना स्पर्श तक नहीं किया।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब मन को महत्त्व नहीं देते हैं तो भीतर से शांति सुख का अनुभव होता है। मन को महत्त्व नहीं देते हैं तो पांचों इन्द्रियों के विषय हमें प्रभावित नहीं कर सकते। शब्द, वर्ण, रस, गंध, स्पर्श इन पांच इन्द्रियों के तेईस विषयों से कर्म बंध नहीं होता, कर्मबंध पांचों इन्द्रियों से जो सूचना आ रही है उन पर जब मन से राग-द्वेष करते हैं, यह अच्छा है या बुरा है तब बंधन होता है। यदि जब मन को जीत लेते हैं और पांचों इन्द्रियों के विषयों को महत्त्व नहीं देते हैं। केवल ज्ञाता दृष्टा भाव में रहते हैं तो पांचों इन्द्रियों के विषय शून्य हो जाते हैं, जिससे कर्म बंध से बच जाते हैं।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘लंका में एक नजारा बड़ा शानदार था, भाई के लिए भाई मरने को तैयार था’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए विजयादशमी पर अपना उद्बोधन दिया
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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