श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि श्रोता तीन प्रकार के होते हैं – विज्ञ श्रोता, अविज्ञ श्रोता और दुर्विज्ञ श्रोता।
विज्ञ श्रोता वह होता है जो एक बात को शीघ्र समझ जाता है। उसकी गहराई में चला जाता है, तह तक पहुंच जाता है। आप कहते हैं कि बुद्धिमान के लिए संकेत पर्याप्त है। ऐसा श्रोता भाव को समझता है, इंगित-आकार को पहचानता है। वक्ता के हृदय को पहचानता है कि वह क्या कहना चाहता है और उसके कहने का क्या प्रयोजन है? ऐसे श्रोता के समक्ष अधिक व्याख्याएं, विवेचन, प्रसंग, कथानक आदि कहने की आवश्यकता नहीं होती। वह सरल रीति से कही गई बात की गहराई तक पहुंच जाता है और एक चीज़ को सरल रीति से ग्रहण कर लेता है। जैसे हंस के आगे दूध और पानी मिलाकर रख दिया जाए तो वह हंस दूध-दूध को ग्रहण कर लेता है, पानी को छोड़ देता है। उसे इस क्रिया में देर नहीं लगती।
उन्होंने आगे फरमाया कि एक अविज्ञ श्रोता होते हैं। अविज्ञ का अर्थ है भोले-भाले, सरल लोग। यद्यपि वे शिक्षित, विद्वान नहीं होते, किन्तु मन के सरल होते हैं। जैसे कि कुक्कर शावक, सिंह शावक, मृग शावक। ये बच्चे भोले-भाले होते हैं, वे अपनी तरफ से वे कोई चीज़ मिलाते नहीं। जानवरों के बच्चों को आप जैसा प्रशिक्षण देते हैं, उसके अनुसार वे करने लगते हैं। कुछ श्रोता सरल हृदय के होते हैं। वे सरल हृदय से बात को सुनते हैं और शीघ्र विश्वास कर लेते हैं क्योंकि सरल व्यक्ति में विश्वास होता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि दुर्विज्ञ यानि कुटिल में विश्वास नहीं होता। वह अपने को कुछ समझता है। दूसरे का कुछ भी नहीं समझता। ये तीन श्रोताओं में आनंद विज्ञ श्रोता था।
उन्होंने आनंद श्रावक ने किस प्रकार बारह व्रतों को सविधि ग्रहण किया इस बारे में फरमाया कि आनंद ने प्रतिज्ञा की कि मैं आज से किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करूंगा, मैं अपने जीवन में कदापि झूठ नहीं बोलूंगा, मैं स्वामी की आज्ञा के बिना कोई वस्तु ग्रहण नहीं करूंगा, स्व-स्त्री की मर्यादा की याने सदाचार व्रत को ग्रहण किया, जो अधिक धन आएगा, साधु-संतों, संघ, तीर्थ, साधर्मी भाइयों, दरिद्रों, दीनों-अनाथों, विपदग्रस्तों की सेवा में मैं उसका व्यय करूंगा। इस प्रकार से उसने अपने परिग्रह की मर्यादा की। हमें भी आनंद श्रावक की भांति जीवन में बारह व्रतों को अंगीकार करना चाहिए जिससे हम भी भगवान के श्रावक कहलाते है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान महावीर का संकल्प का मार्ग था जो आत्मशुद्धि का मार्ग है। व्यक्ति को अपने जीवन में व्रतों को ग्रहण करना चाहिए। व्रतों को ग्रहण करने से पुद्गलों का मोह टूटता है।
उन्होंने उन्मार्ग और सन्मार्ग की चर्चा करते हुए फरमाया कि उन्मार्ग व्यक्ति को भटकाता है और विपरीत दिशा की ओर ले जाता है जो एक तरह से कंटीला रास्ता है। इसके विपरीत सन्मार्ग व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर ले जाता है जो आत्मशुद्धि का मार्ग है।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘प्रभु जी मांगू आपके पास, मेरी पूरी करना आस’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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