श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने श्रावक जीवन की अंतिम साधना संलेखना की चर्चा करते हुए फरमाया कि संलेखना जीवन का अंतिम सार है। जिस तरह से बीज से पौधा उगता है और पौधे में फल-फूल उगते हैं, यदि बीज बोया, फल-फूल नहीं लगे तो उसका कोई महत्त्व नहीं है, उसी तरह बिना संलेखना के जीवन रूपी बीज का कोई महत्त्व नहीं रहता।
उन्होंने फरमाया कि मनुष्य धन कमाता है, व्यक्तित्व का विकास करता है किंतु उससे वह सुखी नहीं हो सकता केवल अपने व्यक्तित्व का पोषण कर सकता है, व्यक्ति का मन इतना चंचल है कि जो पास में है उससे संतुष्ट नहीं होना और अधिक प्राप्त करने की इच्छा रखता है। बाहर की वस्तुओं का, पदार्थों का केवल सुखाभास है जो केवल इन्द्रियों का सुख हैं, आंतरिक सुख प्राप्ति के लिए आत्म ध्यान आवश्यक है। सुख हमारा स्वभाव है, शांति हमारे भीतर है, ज्ञान हम स्वयं हैं, आत्मा ही ज्ञान और ज्ञान ही आत्मा है। मन बुद्धि से आत्मा को देख नहीं सकते पर अनुभव कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जिस तरह से बिना लाईट के पंखे, लाईटें काम नहीं करती इसी प्रकार बिना आत्मा के यह शरीर भी काम नहीं करता। आत्मा ने आत्मा से प्रेम किया इससे बड़ा कोई मित्र नहीं। यदि प्रेम मन, बुद्धि से किया, पुद्गल से किया, संसार के लोगों से किया तो आत्मा शत्रु है। यदि आत्मा को नहीं जाना तो किसी को नहीं जाना यह सत्य है। जीव का जीव में स्थित होना सबसे बड़ा तप है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूूत्र के कर्म आश्रव के प्रकरण में आचार्य उमास्वाती के दृष्टांत का उल्लेख करते हुए फरमाया कि आचार्य उमास्वाती के अनुसार जब तक इस संसार से मुक्त न हो तब तक आनन्द सुख शांति से जीवन जीयें और भविष्य में कभी दुःखी न हो।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति यह चिंतन करे कि उसके जीवन में कैसी भी स्थिति-परिस्थिति, अनुकूल प्रतिकूल आ जाए उसका कारण वह स्वयं है। वह यह चिंतन करे कि भूतकाल में उसने जो कर्म किया उसका उसे फल मिल रहा है जिसे वह समभाव स्वीकार करे तो कर्मों को क्षय कर सकता है।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘मन मंदिर में पधारो भगवन भक्ति हमारी स्वीकारो’’ भजन की प्रस्तुति दी।
दिल्ली से आए योगाचार्य श्री राजकुमार ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि मैं आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. से विगत 13 वर्षों से जुड़ा हुआ हूं, जिससे मेरे जीवन में बहुत बदलाव हुआ है। योगाचार्य का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन द्वारा शॉल, माला द्वारा स्वागत सम्मान किया गया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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