श्रावक को तीन चिंतन नित्य करना चाहिए |

4 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने श्रावक के तीन मनोरथ की चर्चा करते हुए फरमाया कि श्रावक के तीन मनोरथ में पहला मनोरथ है वह दिन धन्य होगा जिस दिन मैं छहकाय जीवों का आरम्भ समारम्भ तथा अपने धन-सम्पत्ति-रूप परिग्रह का त्याग करूँगा, घटाऊँगा। दूसरा मनोरथ है वह दिन धन्य होगा जिस दिन मैं गृहवास की मोह-माया और विषय-वासना का, आरंभ-परिग्रह का त्याग करके साधु-जीवन स्वीकार करूँगा और तीसरा मनोरथ है वह दिन धन्य होगा जिस दिन मैं अपनी व्रत-यात्रा को सकुशल, निर्विघ्न भाव से पूर्ण कर अन्त समय में आलोचना, निन्दा एवं गर्हणा करके संलेखना पूर्वक संथारा ग्रहण करूँगा, वह दिन मेरे लिए परम कल्याणकारी होगा। ऐसा चिंतन श्रावक को नित्य करना चाहिए।

उन्होंने फरमाया कि मनुष्य ने पूर्व भव में अनेक जीवायोनियों में भ्रमण किया वह सातों नरकों में भी गया वह जिस योनि में गया वहीं अपने शरीर का पोषण करता रहा। जितना आयुष्य कर्म जीव का है उतना ही रहता है। बाद में देह राख बन जाती है इसलिए इस देह का मोह नहीं करना चाहिए। जितना ज्यादा शरीर का मोह करते हैं उतना ज्यादा दुःखी होते हैं।

उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति भूतकाल, भविष्यकाल की चिंता न करते हुए केवल वर्तमान क्षण में रहे। वर्तमान क्षण ही महत्त्वपूर्ण है, जिसे आते-जाते श्वांस को देखकर भी साधा सकता है, यदि क्रोध आता है तो भी श्वांस को देखो। क्रोध से चेहरा लाल हो जाता है, क्रोध एक तरह से जहर के समान है और क्षमा अमृत के समान है, क्रोध सभी को आता है परंतु क्रोध आए तो शांत रहना सीखो।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि कर्म और धर्म दो बाते हैं। धर्म कब होता है जब आप स्वभाव में स्थित होते हैं। जब जब आप अपने स्वभाव से अपरिचित रहते हैं या स्वभाव को जानते हुए विभाव में चले जाते हैं तब कर्म बंधते हैं। स्वभाव में धर्म होता है और विभाव में कर्म का बंधन होता है।

प्रवचन प्रभाकर शमित मुनि जी म.सा. ‘‘आ गा ले प्रभु के गीत तेरे दिन बीते जाते हैं, तेरा सुना पड़ा संगीत तेरे दिन बीते जाते हैं।’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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