

ध्यान गुरु आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में बुधवार को विश्व ध्यान दिवस के रूप में आयोजित हुआ जो प्रातः 9.25 से दोपहर 12.30 तक चला। जिसका लाईव प्रसारण यू ट्यूब, पारस चैनल पर किया गया। ध्यान का प्रारंभ श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने नवकार महामंत्र से शुरू किया।
ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि मनुष्य अपना पूरा जीवन व्यक्तित्व पर लगा देता हैं, जो शरीर का आकार मिला है वह व्यक्तित्व है, मिथ्या दर्शन के कारण जीव अपने अस्तित्व को भूल गया और उसने सारी शक्ति देह को दे दी। मिथ्या दर्शन के कारण जब तक इस देह को अपना मानोगे तब तक साधना की शुरूआत नहीं हो सकती। वीतराग यात्रा भी धर्म ध्यान व शुक्ल ध्यान के साथ शुरू होती है।
श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आसन एवं योग की क्रियाएं करवाते हुए फरमाया कि यह साधना शिविर दृष्टि बदलने का शिविर है। साधक वह होता है जो हर परिस्थिति में, हर अवस्था में आनन्द से जीवन जीने की कला को जानता है। परिस्थतियां बदलती रहती है हम आर्त्त-रौद्र चिंताओं में ही सारा समय गंवा देते हैं। अगर दृष्टि को बदल दिया, शरीर से आत्मा पर आ गए तो आत्मा में अनंत सुख, अनंत शक्ति है।
श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने एक दिवसीय, चार दिवसीय, दस दिवसीय शिविरों की जानकारी में फरमाया कि आत्म ध्यान के शिविर नाशिक, कुप्पकलां आदि केन्द्रों पर प्रतिमाह आयोजित होते हैं जिसमें कोई भी आत्मार्थी साधक सहभागी बन सकता है और अपना आत्मा कल्याण कर सकता है।
शिविर के प्रारंभ एवं मध्य में वीतराग साधिका निशा जी ने शुक्ल ध्यान का गहन प्रयोग करवाया। उन्होंने कहा कि आत्मा में अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान है जो इस देह में नहीं। मन, बुद्धि, इन्द्रियों को गौण कर दें और अपने आप में ठहर जाएं, अनंत सुख के अनुभव के लिए आपको आपमें उतरना है। यानी जीव को अपने आप में ठहरना हैं पहले स्वरूप को जाना, जड़ और जीव के भेद को जाना, अब भेद को जानकर जीव स्वयं में ठहरने का प्रयास करे जहां मन पूरी तरह गौण हो, विचार
मध्य न हो। न भूतकाल, न भविष्यकाल, वर्तमान में जीव अपने आपको जानता हुआ यहीं ठहर जाए।
शिविर का समापन ध्यान गुरु शिवाचार्य श्री जी ने आलोचना, मंगल मैत्री एवं मंगल पाठ के साथ हुआ।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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