श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने सोमवार को अपने उद्बोधन में दान के बारे में बताते हुए फरमाया कि किसी भी निमित्त से किसी को कोई वस्तु देना दान है। कोई संत महात्मा आ जाये तो उन्हें शुद्ध भावना के साथ भोजन का दान देना चाहिए। दान के साथ शुद्ध भावना जुड़ जाती है तो वह अधिक फलदायी होती है।
उन्होंने दस प्रकार के दानों में अभय दान को उत्तम दान बताते हुए फरमाया कि अभयदान महत्त्वपूर्ण दान है। स्वयं अपनी ओर से किसी प्राणी को भय न पहुँचाना और किसी कारण से भय में पड़े हुए को निर्भय बनाना, उसके भय को दूर करना अभयदान है। दान सभी अच्छे हैं, मगर अभयदान सब में प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन प्रिय है और मरना अत्यन्त ही अप्रिय है। सर्वस्व का त्याग करके भी मनुष्य प्राणों की रक्षा करना चाहता है। ऐसी स्थिति में किसी मरते प्राणी को बचा लेना कितना भारी पुण्यकृत्य है।
उन्होंने मम्मण सेठ के प्रसंग के माध्यम से फरमाया कि मम्मण सेठ ने उत्कृष्ट भाव से दान दिया था उसके कारण तो बहुत उत्कृष्ट पुण्य का बंध हुआ तथा उस पुण्य के प्रताप से उसे मम्मण सेठ के भव में खूब ऋद्धि सिध्दि सम्पत्ति मिली। परन्तु बाद में दान देकर जो पश्चाताप किया उसके कारण अंतराय कर्म का बंध हो गया जिससे प्राप्त सम्पत्ति का भोग नहीं कर सका। सारी उम्र वह इसी तरह तृष्णा में पूरी कर गया। अपार धन वैभव होकर भी उसका उपभोग नही कर सका क्योंकि दान तो दे दिया लेकिन दान देकर पश्चाताप किया उस कारण धन का उपभोग नहीं कर सका। इसलिए कहा है-दान देकर पश्चाताप मत करो।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि काया को स्थिर करने के लिए मन और वाणी का विशेष महत्त्व है। जब मन, वाणी के साथ ध्यान किया जाता है तो उस अवस्था में जीव का स्वयं में स्थित होने की प्रक्रिया है। जीव का चिंतन करना धर्मध्यान हैं और पर का चिंतन करना आर्तध्यान है। विवेक में धर्म है बेहोशी में बंधन है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘क्षण भंगुर संसार है, माया का संसार है, बच पाया न कोई यहां जब लगी मौत की मार है’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज नाशिक से दस दिवसीय शिविर पूर्ण होने के पश्चात शिविरार्थी दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
श्री देवीलाल भटेवरा ने आज 30 दिन व बाली बाई भटेवरा ने 7 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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