भगवान महावीर की साधना भेद विज्ञान की साधना है |

26 SEPTEMBER 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति जब भी कोई तप करता है, आराधना करता है उसके पीछे भाव कैसा रहना चाहिए वह महत्त्वपूर्ण है। जब कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलते हुए अपने स्वभाव में रहता है तो अनंत कर्मों की निर्जरा करता है। यदि तप करने वाला तपस्वी गुप्त रूप से तप करता है तो उसका अधिक फल मिलता है, जिसमें कर्त्ता भोक्ता का भाव नहीं जुड़ता है। गुप्त तप से आनन्द एवं उल्लास का भाव आता है और वह तप कर्मों की निर्जरा में सहायक होता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि मासखमण तप करना अपने आप में विशेष है। जब मासखमण तप करते हैं एक महीने तक बिना अन्न ग्रहण करते हुए केवल पानी के सहारे रहते हैं तो उस समय शरीर के अंदर वेदना होती है, विकार आते हैं तो उस समय शरीर और आत्मा का भेद करना चाहिए।

उन्होंने भगवान महावीर की साधना को भेद विज्ञान की साधना है बताते हुए फरमाया महावीर की साधना भेद विज्ञान से शुरू होती है। जिसमें शरीर और आत्मा का भेद है जो आत्म ध्यान शिविर के माध्यम से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। आत्मा में अष्टगुणों की संपदा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत शक्ति जीव के पास विद्यमान है। यदि जीव 48 मिनट भी अपने में ठहर जाए तो केवल ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र के माध्यम से फरमाया कि कर्म प्रवेश का रास्ता आश्रव है। आश्रव संसार के बंधन में डालते हैं। आत्मा में छिपे हुए कर्मों का जो क्षय करने का रास्ता है निर्जरा है। काया, वाणी और मन से कर्म का योग बनता है, जिसके द्वारा कर्म आत्मा के साथ जुड़ते हैं। काया में पूरा शरीर है जो औदारिक दिखता है काया में कार्मण काया भी आ गई। काया से कार्मण शरीर में जो कर्म बाहर निकलकर आते हैं आकषर्ण पैदा होता है और काया कुछ क्रिया करती है। काया की क्रिया और आत्मा के बीच जो शक्ति पैदा होती है उस आकर्षण से वातावरण में जो काया में कष्ट होता है उस आधार पर हम वचन में अभिव्यक्ति करते हैं वाणी के द्वारा बोलते हैं उससे मन दुषित हो जाता है मन में जो विचार पड़ता है वह चलता ही रहता है इस प्रकार तीनों प्रकार से आश्रव होते हैं।

प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘नवकार जपने से सारे सुख मिलते हैं।’’ भजन की प्रस्तुति दी।

इन्दौर से श्रीमती अनुराधा पुगलिया ने अपने 27वें मासखमण तप के तहत आज 59वें उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का माला, प्रशस्ति पत्र भेंट कर स्वागत सम्मान किया।

- आचार्य शिवमुनि

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