

आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने शुक्रवार को 20 सितम्बर से 23 सितम्बर तक आयोजित शिविर के प्रथम दिन आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि जीव तत्व निराकार है, जिसका कोई आकार नहीं है। आत्मा की कल्पना नहीं की जा सकती उसका तो केवल अनुभव किया जा सकता है। आत्मा में श्रद्धा करने के लिए आत्मा के गुण अनुभव में आते हैं। व्यक्ति का मन भटकता रहता है वह कभी भूतकाल में चला जाता है तो कभी भविष्य काल में चला जाता है, मन को स्थिर रखने के लिए अर्थात् वर्तमान क्षण में स्थिर रहने के लिए आते-जाते श्वास को देखें।
उन्होंने श्वांस के साथ ‘सोहम्’ का प्रयोग करवाते हुए फरमाया मनुष्य जाति सब जीव को अपने समान समझें, आत्म दृष्टि से सभी जीव समान है कण-कण में मेरे जैसा जीव विद्यमान हैं। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति सभी में एक समान जीवात्मा हैं। अपने भीतर गहन मौन शांति का अनुभव करते जाएं। सोहम् कोई मंत्र नहीं है एक ऐसी प्रक्रिया है आत्म परमात्मा मिलन की ध्वनि है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया जब तक शरीर आत्मा का भेद नहीं होगा तब तक व्यक्ति के कर्म क्षय नहीं होंगे। पाप या पुण्य में बांधने से जीव मुक्त नहीं हो सकता। जिस तरह किसी बड़े बंगले में किसी व्यक्ति को नजरबंद कर दिया जाए तो वह बाहर आने को आतुर रहता है उसी तरह देवता भी मनुष्य जन्म पाने के लिए तरसते हैं क्योंकि मनुष्य का जीव ऐसा है अपनी आत्मा के साथ जुड़कर, साधु बनता है सब सुख सुविधा का त्याग कर देता है और अपने कर्मों की निर्जरा करता है।
आज की सभा में श्री अनिल मेहता ने 30 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान किया।
विशेष- आज 20 सितम्बर से 29 सितम्बर तक चलने वाले दस दिवसीय ऑनलाइन आत्म ध्यान शिविर का प्रारंभ हुआ। इस शिविर में दिल्ली, उदयपुर, लोगोंवाल, कुप्पकलां, नाशिक, सूरत के साधकों ने भाग लिया। इस लाईव प्रसारण में अरिहंत नगर दिल्ली में उपप्रवर्तिनी श्री रश्मि जी म.सा. ठाणा-2 के सान्निध्य में 102, लोगोंवाल (पंजाब) में महासाध्वी प्राचीजी म.सा. के सान्निध्य में 32, महावीर भवन भटार रोड सूरत में महासाध्वी श्री संबोधि जी म.सा. ठाणा के सान्निध्य में 72 साधकों ने भाग लिया, उदयपुर में 54, आदीश्वरधाम कुप्पकलां में 64 नाशिक में 47 साधकों ने भाग लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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