

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि सामायिक दो शब्द मिलकर अर्थात् दोनों के संयोजन से सामायिक शब्द बना है। सम का अर्थ है-समता। मन की समता, आय का मतलब सामायिक वह अनुष्ठान है, वह अभ्यास है, वह साधना है, जिसके द्वारा व्यक्ति को समता की आमदनी होती है। भगवान ने कहा धर्म न दिया जा सकता न ही लिया जा सकता। धर्म मनुष्य के भीतर है। धर्म होता है धर्म जीया जाता है।
उन्होंने फरमाया कि बर्हिआत्मा का लक्षण है बाहर की प्रवृति करना है जैसे बाहरी पुद्गल व्यक्ति, वस्तु, स्थान, घर, जिससे रागात्मक संबंध होता है वह बर्हिआत्मा। बाहर है उसे भीतर लाने का प्रयास करना ही सामायिक है, साधना है। सामायिक करो तो अंदर में आ जाओ। मन को छोड़ो, मन कपटी है लालची है मन गुलाम बनाएगा। मन से मौन होने का प्रयास करो। काया के मौन के साथ मन का मौन भी जरूरी है कि भीतर से भी कोई किसी प्रकार की प्रवृत्ति न हो ऐसा प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने फरमाया कि जब कोई व्यक्ति एक कुएं की खुदाई करते हैं तो उसमें कुड़ा करकट, झाड़ निकलता है उसको और गहरा खोदने पर साफ पानी निकलता है इसी तरह व्यक्ति के भीतर अनेक विचार भरे हुए हैं। केवल अकेले होकर भीतर से भीतर गहराई में जाने का प्रयास करने पर साधना में आगे बढ़ सकते हैं।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया जीव ने देह के पुद्गल को स्पर्श नहीं किया। जैसे शरीर को तीव्र भुख लगी तो शरीर ने शरीर को भोजन दिया। भोजन से तृप्त होने के बाद भोजन अच्छा बना, भोजन अच्छा नहीं बना इसे लेकर मन में भाव बनाते रहते हैं, इन विकारी भावों के कारण बंधन होता है। मन काया पराया है पराये को महत्त्व नहीं देना है। आंख बंद करने पर अनुभव में आता है भूत और भविष्य काल के वस्तु स्थान के विचार भरे हुए हैं वस्तु को लेकर विचार बना लिया। देखकर महत्व जिसे महत्त्व देते हैं छाप बनकर मन में रह जाता है। व्यक्ति के मन में विचार व्यक्ति, स्थान, वस्तु को गौण करोगे मन के साथ रहना आ गया अर्थात मन को साध लिया तो बंधन से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘उठ जाग मेरे चैतन्य प्रभु तू अमर अविनाशी है’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज श्री अनील मेहता ने 25 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान किया, श्री देवीलाल भटेवरा ने 15 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान किया। जिन शिवाचार्य आत्मा ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शाॅल, माल, स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत सम्मान किया।
आज पाण्डेसरा (सूरत) से 40 महिला मण्डल का संघ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुआ।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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