कर्मों का फल स्वयं को ही भुगतना पड़ता है |

14 SEPTEMBER 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका से चार तीर्थ के समान है। इन चारों का स्थान एक तरह से बराबर है क्यों कि साधु आहार के लिए श्रावकों के घर जाते हैं और जब श्रावक उपाश्रय में जाते हैं तो साधु उन्हें धर्म का उपदेश देते हैं और श्रावक विनम्रता पूर्वक सुनते हैं।

उन्होंने फरमाया कि हर संसारी व्यक्ति को अपने कर्मों को भुगतना पड़ता है। भगवान महावीर, भगवान् पाश्र्वनाथ के जीवन को देखें तो उनको भी अपने पूर्व जन्मों के कर्मों को भोगना पड़ा। स्तुति, वंदना, प्रार्थना से कर्मों को काटा नहीं जा सकता कर्मों का फल व्यक्ति को स्वयं ही भुगतना पड़ता है।

उन्होंने यह भी फरमाया कि कार्मण शरीर ही आगे गति तय करता है। जीव को जिस गति में जाता है वह कार्मण शरीर को लेकर जाता है। चाहे वह देवगति में जाए चाहे तिर्यंच गति में जाए। ध्यान की पहली साधना है कि इस देह को अपना मत मानो। शरीर और आत्मा का भेद करो। यह शरीर अनंत बार मिल गया। अपनी आत्मा का ध्यान करोगे तो ही जीवन का कल्याण हो सकता है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया जीव का राग आदि विकार के भावों के कारण बंध होता है। एक संयोग के अधिन एक जीव देह में रहने आया है पर दोनों भिन्न हैं यह भेद नहीं होगा तब तक मोक्ष की यात्रा चालू नहीं होगी। अनंत जीव इस ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं जहां उसके छूने पर सुख दुःख का अनुभव होता है वहां उसका जीव हैं। जिस तरह से किसी व्यक्ति को इंजेक्शन लगाने से पहले पूरे शरीर के आत्मप्रदेशों में वहां आभास हो जाता है। आभास होने वाला वह जीव है। बिना जीव के वह आभास नहीं कर सकता।

श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘गुण सौरभ से रहे महकता जहां जीवन सुखकर हो ऐसा अपना घर हो’’ एवं श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘तिरजा रे तिरजा अंतर मन में ज्योत जगा जा’’ भजन की प्रस्तुति दी।

आज की सभा में सचिन (सूरत), गुड़गांव लुधियाना, मलोट (पंजाब) आदि अनेक जगहों से श्रावक-श्राविकाएं दर्शन हेतु आये।

- आचार्य शिवमुनि

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