कर्मों के फल को बदला नहीं जा सकता |

11 SEPTEMBER 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि संसार व्यवहार जगत के आधार पर चलता है और व्यवहार जगत पुद्गल से जुड़ा हुआ है, मन के विचार भी पुदगलों से जुड़े हुए हैं विचार भी स्वयं अपने आप में पुद्गल है। व्यक्ति जब अपने मन के पीछे भागता है तो उसका बंधन चलता रहता है। जब व्यक्ति का मन स्थिर होता है अर्थात् जब मन में जीव का चिंतन होता है, उस समय कर्मों निर्जरा होती है। भगवान की वाणी के अनुसार क्रिया जो भी करो लेकिन उस समय जीव कहां है, उसका विशेष महत्त्व है। जहां मन रूक गया वहां जीव है इसलिए मन को स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने फरमाया कि मन स्थिर रहे जीव अपने स्वभाव में है वह मन, वचन और काया से कुछ कर नही रहा है तो यह समझना चाहिए कि जीव ने अपनी शक्ति मन को नहीं दी वह शुक्ल ध्यान की स्थिति में है। मनुष्य ने अज्ञान, मिथ्यात्व अवस्था में जीव को गौण कर दिया और मन को महत्त्व दे दिया। मन में असंख्य विचार भरकर रखने के कारण मन स्थिर नहीं हो सकता। एक समय के लिए भी मन खाली नहीं बैठना चाहता। मन में चंचलता के कारण व्यक्ति कभी भविष्य में तो कभी भूतकाल में चला जाता है।

उन्होंने यह भी फरमाया कि जिस तरह से आम का बीज डालने से आम का ही पौधा तैयार होगा उसको बदला नहीं सकता इसी प्रकार व्यक्ति के किये हुए कर्मों का फल बदला नहीं जा सकता। व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार जैसा भी फल मिले उसे भोगते समय दृष्टा भाव में रहे तो वह कर्मों को क्षीण कर सकता है। स्वभाव में रहने से कर्म क्षय होता है और विभाव अवस्था में रहने से कर्मों का बंधन होता है यही पुरुषार्थ है।

श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘क्षण भंगुर है जीवन तेरा क्या तूने ऐसा सोचा है, हस्ती है पल दो पल की क्या तूने ऐसा सोचा’’ भजन की प्रस्तुति दी और शाश्वत मुनि जी ने अपने उद्बोधन में जीवन में सकारात्मक विचार को जरूरी बताया।

आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में सूरत की चाहत माण्डोत, लुधियाना की रेणू जैन ने आठ दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया, तपस्वियों को शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शाॅल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा स्वागत-सम्मान किया। श्री अनिल मेहता ने 21 उपवास का प्रत्याख्यान किया।

- आचार्य शिवमुनि

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