श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि आठ गुणों से युक्त शुद्ध आत्मा है, आत्मा निराकार है उसका कोई आकार नहीं, उसका कोई रूप नहीं। इस निराकार रूपी आत्मा का ध्यान करना ही मंगलकारी है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति मिथ्यादृष्टि के कारण जीव को गौण कर वह अजीव में सुख ढूंढता है। जब जीव में सुख ढूंढता हैं तो अजीव के भरे हुए विचार, अजीव के संस्कार, मिथ्यात्व रूपी धारणाएं बीच में आ जाती है और वह जीव को गौण कर देता है।
उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति धर्मस्थलों में देवाओं व संतों से अपने सुखी होने के लिए मंगल कामना चाहता है, साता-असाता पुद्गल की अनुकूलता, पुद्गल के सुख के लिए मालाएं फेरता हैं, जो केवल पुद्गल का सुख है। व्यक्ति भ्रांति के कारण पुद्गल की साता को सुख मान लेते है। साता और सुख का अंतर हैं जड़ और जीव में भेद करना। जड़ कभी जीव में नहीं जा सकता और जीव कभी जड़ में नहीं जा सकता।
उन्होंने तत्वार्थ सूत्र की चर्चा करते हुए फरमाया कि तत्वार्थ सूत्र सबके लिए है जिसमें सारी जिनवाणी को समाहित किया गया है जिसे तत्व का बोध हो गया उसे सम्यक् दर्शन हो सकता है। तत्व का बोध हुए बिना मुक्ति नहीं है। तत्व के बोध हो तो जीव केवलज्ञान प्राप्त कर सकता है। तत्व बोध होने से श्रद्धा होगी श्रद्धा से ज्ञान होगा, ज्ञान और श्रद्धा से जीव अपने स्वभाव में रहता और अपने स्वभाव में रहने के कारण उसके अंदर का ज्ञान प्रकट हो सकता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जिस व्यक्ति को तत्व का बोध नहीं केवल क्रियाओं में विश्वास करता है तो क्रियाओं से बंध होगा, जहां बंध है वहां मोक्ष नहीं हो सकता। व्यक्ति अपने कर्मों को क्षय कर ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जिया कब तक उलझेगा संसार विकल्पों में, कितने भव बीत गये संकल्प विकल्पों में’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में तपस्वियों ने 9 दिन का उपवास कर पारणा किया जिसमें अवध संगरीला की श्वेता गौतम मेहता, कड़ोदरा केे विनय केशरीमल वडालमिया ने पारणा कर आशीर्वाद प्राप्त किया नाशिक से रेणु जैन ने परोक्ष रूप से 7 उपवास का प्रत्याख्यान किया। श्री अनिल मेहता ने 20 उपवास का प्रत्याख्यान किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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