धर्म का मूल है दर्शन |

4 SEPTEMBER 2024

आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के चैथे दिन अपने उद्बोधन में फरमाया पर्युषण का शब्द कहता है कि अपने को सीमित कर लो। अपने में स्थित हो जाओ। मात्र केवल अपने को जानो, दुनिया को जानने से कुछ नहीं होगा। दुनिया भर की पढाई करने से, व्याकरण छंद, वेद, उपनिषद, गीता सब पढ़ लो किंतु अपने को नहीं जाना कि मैं हूं कौन? मेरा अस्तित्व क्या है? मैं किसलिए आया हूं? और मुझे करना क्या है? यह मुझे शरीर मिला है इस देह का मैं क्या कर रहा हूं। यदि ये बातें जीवन में आ जाए तो जीवन में आपका मंगल होगा।

उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति की जैसी दृष्टि होती उसे वैसा ही दिखाई देता है, जैसे किसी व्यक्ति में शैतान भी मिल सकता है, तो किसी में भगवान भी मिल सकता है। कुछ लोग शैतानों में ही रहना पसन्द करते हैं वे सब शैतान को ही खोजते रहते हैं। उनकी दुनिया नर्क हो जाती है। उनको हर आदमी बुरा दिखाई पड़ता है फिर उन्हें बुरे आदमियों के बीच में रहना पड़ता है। जाओगे कहां, यही तो आदमी है। इन्हीं आदमियों के बीच कोई स्वर्ग में रह लेता है, क्योंकि वह हर आदमी में भला देखता है। हर आदमी में भला देखा जा सकता है।

उन्होंने फरमाया कि जिस प्रकार पेड़ का आधार जड़ है उसी प्रकार धर्म का मूल दर्शन है। तत्व दो है जीव और अजीव। जीव को जानना, जीव का अनुभव करना, जीव में रूचि करना। चारों ओर पुद्गल के इस संसार में एक जीव पर श्रद्धा करना कठिन है, किंतु असंभव नहीं है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वांचन करते हुए फरमाया कि हम अंतिम श्वासोश्वास तक अपने लक्ष्य को मुख्यता दें, एक-एक समय का उपयोग स्व के लिए करें। जितना समय विभाव में रहे उतने ही कर्म के बंधन चलते रहते हैं। अगर हमने जीव को केन्द्र बिन्दू और पिण्ड को पराया मान लिया। एक-एक समय जीवन को देना शुरू कर दिया तो हमारी साधना में तीव्रता आ जाएगी और इसके विपरीत पुद्गलों को महत्त्व दिया तो संसार बढ़ जाएगा। अंतकृत सूत्र से समझना है कि केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया और सिद्धशिला को पा लिया हम अंतिम श्वासो श्वास तक जीव को महत्त्व दें और सिद्धशिला की ओर आगे बढ़ते जाएं।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा ने अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।

इस अवसर पर श्री अनिल मेहता ने 14 उपवास के प्रत्याख्यान किये। ऑनलाइन के द्वारा पूर्वी हितेश मेहता ने 27 उपवास के प्रत्याख्यान लिये और कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासना, आयंबिल, उपवास, बेला, तेला, चैला, पंचोला आदि तपस्याओं के प्रत्याख्यान लिये।

- आचार्य शिवमुनि

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