


आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के तीसरे दिन ‘‘पर्व पर्युषण प्यारा जग को जगाने आया’’ भजन सुनाते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया जब यज्ञ होता है तो आहुति देनी होती है। इसी तरह पर्युषण पर्व के इन आठ दिनों में मिथ्यात्व, अज्ञान, राग-द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ की आहुति देनी है। व्यक्ति को जहां लगता है कि मेरे भीतर इस प्रकार की मनोवृत्ति है, इस प्रकार की ग्रंथि है तो उसको छोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने फरमाया कि अज्ञान और मोह के संपूर्ण त्याग से राग और द्वेष के क्षय होने से एकांत स्वरूप जो जीव है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। महावीर के शासन में साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविक ये चारों तीर्थ के समान है जो तीनों लोकों का प्रकाश करने वाले हैं। जो व्यक्ति समता में है तो वह मोक्ष में है, ममता में हैं तो संसार में हैं, लोभ में है तो संसार में है और निर्लोभ में है तो मोक्ष में है। जब व्यक्ति के भीतर आलोचना प्रतिक्रमण का भाव आता है तो वह मोक्ष के मार्ग पर चला जाता है। यदि उसमें अहंकार, क्रोध, मान, माया लोभ है तो वह संसार के मार्ग पर आ जाता हैं, इसलिए राग-द्वेष का भेदन करे उससे अधिक सुखी होने का मार्ग नहीं है।
उन्होंने कर्म को जन्म-मरण का मूल बताते हुए फरमाया कि संसार का मूल है कर्म और कर्म के दो बीज है राग और द्वेष। कर्म से मोह पैदा होता है और कर्म ही जन्म-मरण का मूल है और जन्म मरण है वह दुख कारण है। राग के समान कोई अग्नि नहीं है, राग-द्वेष में आकर व्यक्ति उलझ जाता है। इसलिए किसी चीज की वासना हो उसे मन से निकाल देना चाहिए।
श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वाचन करते हुए फरमाया कि मनुष्य के तीन मनोरथ है आरंभ परिग्रह का त्याग करके अल्प करना। दूसरा मनोरथ प्रवज्जा ग्रहण करना, तीसरा मनोरथ समाधि को प्राप्त करते हुए पण्डित मरण को प्राप्त करना है। इसी प्रकार साधु के तीन मनोरथ है – पहला वह दिन धन्य होगा कि मैं एकाकी विचरण करके नये-नये शास्त्र का ज्ञान सीखूं। दूसरा मनोरथ एकाकी विचरण करके प्रतिमाओं को धारण करूं। तीसरा मनोरथ अंतिम समाधि को प्राप्त करूं। गौतम अणगार ने साधु के बारह प्रतिमाओं को धारण कर अंतिम श्वांस में मुक्ति को प्राप्त किया।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा ने ‘‘जय जय जयकार पर्युषण’’ भजन की प्रस्तुति के साथ अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।
महिला मण्डल ने भजन प्रस्तुति के साथ तप अनुमोदना की लघु नाटिका प्रस्तुत की।
आत्म ध्यान फाउण्डेशन के ट्रस्टी श्री अशोक मेहता ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए बाहर से आए हुए अतिथियों का अभिनन्दन किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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