


आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के दूसरे दिन ‘‘पर्व पर्युषण प्यारा जग को जगाने आया’’ भजन सुनाते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि पर्युषण ऐसा पर्व है जो जन्मों-जन्मों के पड़े हुए विकार को नष्ट करता है। जैसे कुड़े के ढेर को माचिस की तिल्ली से जला दिया जाता है ऐसे ही जन्मों-जन्मों के जो कर्म है उसको नष्ट करने का पर्व है पर्युषण।
उन्होंने फरमाया कि पर्युषण महापर्व दृष्टि को निर्मल करने का पर्व है। अपने आपको जानना, व्यक्तित्व को छोडकर अपने अस्तित्व में आना, संसार से परमात्मा की ओर जाना, व्यवहार से निश्चयनय में आ जाना, जड़ से जीव में आना, मिथ्यात्व से समकीत की ओर आना है। व्यवहार जगत में मनुष्य ने अनेकों जन्मों में इस आकार को महत्व दिया है। जो निराकार है, जो सदाकाल से तुम्हारे साथ है और रहेगा उसको जानो-समझो और उसे महत्त्व दो। सभी तीर्थंकरों की वाणी का एक ही सार है कि जीव अपने को जान ले, अपने को मान ले, आकार को छोड़ दे, निराकार में आ जाए और उसमें निरंतर रहने का प्रयास व पुरुषार्थ करे। जितना स्वस्थिति में रमण करेगा वह आगे बढ़ जाएगा।
उन्होंने फरमाया कि छह दिशाओं में प्राणी मात्र के लिए सबके प्रति मैत्री की भावना रहनी चाहिए। जिनके पास धन है वे धन देते है। कई तपस्वी तप कर रहे हैं, कोई शील का पालन कर रहा है तो कोई उच्च संयम की साधना कर रहा है, जो श्रावक बारह व्रत धारण कर रहा है उसकी अनुमोदना करनी चाहिए। जिसमें जो भी गुण है, उसकी अनुमोदना करनी चाहिए।
किसान खेती करता, व्यापारी व्यापार करता है, स्कूल में अध्यापक पढ़ाता है वह भी राष्ट्र निर्माण में सहयोगी है, एक स्कूल में चपरासी काम करता है वह भी राष्ट्र निर्माण के लिए है। हर व्यक्ति ईमानदारी से कार्य करता है वह देश को ऊंचा उठाने में सहभागी बनता है।
श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वाचन करते हुए फरमाया कि उन महान आत्माओं ने तीर्थंकर महापुरुषों का सत्संग प्राप्त किया, सत्य का बोध प्राप्त किया। सत्य पर श्रद्धा की, सत्य को समझा और सत्य को जीया तो उसी भव में उसी शरीर से, जो शरीर कर्म बंधन का कारण बन रहा था, उसी शरीर को साधन बनाकर के साध्य तक पहुंच गए। अज्ञान दशा में जो हम साधन से मोह कर लेते हैं तो साधन संसार को बढ़ा लेते हैं उसी को जब ज्ञान दशा में उसका उपयोग कर लेते हैं अपने लक्ष्य की ओर है तो वह साधन हमारा सहयोगी बन जाता है। यह संसार अनादिकाल से चल रहा हैं चार गति 84 लाख जीवयोनि में जीव अनादिकाल से यात्रा कर रहा है। कोई संसार यात्रा कर रहा है तो कोई वीतराग यात्रा कर रहा है। जैसी जिसकी दृष्टि है वैसी सृष्टि है। जिनका काल परिपक्वता की ओर आता है, उनको कोई निमित्त बनता है और जीव अपनी कार्य सिद्धि के लिए आगे बढ़ जाता है।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा ने ‘‘जीवन अपना सफल बना लो वैर विरोध मिटा लो पर्युषण आ गए हैं’’ भजन की प्रस्तुति के साथ अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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