

जैन धर्म का पर्वाधिराज पर्युषण पर्व आज रविवार को प्रारंभ हुआ। इस आठ दिवसीय पर्युषण को पर्वों का राजा कहा जाता है। यह पर्व भगवान महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत ‘‘अहिंसा परमो धर्मः – जिओ और जीने दो’’ की राह पर चलना सिखाता है और मोक्ष के द्वार खोलता है।
आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. शिवमुनि जी म.सा. आदि ठाणा 7 के सान्निध्य में पर्युषण पर्व में निरंतर आठ दिन प्रार्थना भक्ति, श्री अन्तकृतदशांग सूत्र वाचन, प्रवचन, वीतराग साधिका निशाजी द्वारा शुक्ल ध्यान का प्रयोग, सामूहिक नवकार जाप, मंगल पाठ, प्रतिक्रमण आदि विभिन्न धार्मिक क्रियाओं का आयोजन होगा।
आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के प्रथम दिन अपने उद्बोधन में फरमाया कि साधक वर्षभर संसारी कार्यों में लगे रहते हैं। पर्युषण पर्व वर्षभर की क्रियाओं के अवलोकन के दिन हैं। संसार में सामान्यत: व्यक्ति का अधिकांश समय राग में बीतता है। राग का प्रतिक्रमण कितना करते हैं? राग को तोड़ने की विधि क्या है? इन प्रश्नों का समाधान है स्वाध्याय। स्वाध्याय के द्वारा साधक उन महान आत्माओं के जीवन चरित्र का अध्ययन कर यह जान सकता है कि उन चरित्रात्माओं ने किस प्रकार राग को तोड़कर अंतिम श्वास तक केवलज्ञान को प्राप्त किया व निर्वाण को प्राप्त हुए।
श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि जिनवाणी में गजसुकुमाल आदि चरित्र को सुनते हैं तो वैसे भाव साधक में पैदा होते हैं। पर्युषण के दिनों में संतों के मुख से प्रभु की वाणी का श्रवण करने से जीवन में वैराग्य आता है व साधक उस दिशा में आगे बढ़ने का पराक्रम करता है, इसलिए इन दिनों में सारे संसार के कार्यों को सीमित करके अपने अध्यात्म, अपनी साधना, अपनी आत्मा की ओर आगे बढ़ने का
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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