आत्मा में अष्टगुणों की संपदा है |

31 AUGUST 2024

‘मेरे पास मेरे अलावा कुछ नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड में मेरा अपना अस्तित्व है। जिस गति जिस योनि में जाएगा यह काया नहीं रहेगी परंतु जीव रहेगा, उसका अपना अस्तित्व रहेगा। एक जीव के हो जाओ सब मिल जाएगा। अनादिकाल की भूल कि जीव अपने को भूल गया। अनंत संसार में भटकने का मूल कारण जीव ने इस काया को अपना मान लिया। मन, पुद्गल, इन्द्रियों को अपना मान लिया। मेरा इस संसार में कुछ नहीं, नितांत अकेले हो जाओ, एकत्व भावना का पोषण करें। मैं देह नहीं, देह मेरी नहीं, मैं अकेला मेरे में अष्टगुणों की संपदा है, आठ गुण मेरे भीतर है।’’ उपरोक्त विचार ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाए।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म. सा. उद्बोधन में फरमाया कि पर्युषण के दौरान प्रतिदिन एक समय का भोजन करने से साधक का शरीर स्वस्थ रहता है। श्रावक विवेकपूर्वक, संयमपूर्वक साधना, आराधना करे तो वह भी संसार सागर से तिर सकता है।

उन्होंने पौषध का महत्त्व बताते हुए फरमाया कि पौषध का मतलब उस दिन संसार से निवृत होना, एक दिन के लिए साधु की तरह रहना। संसार के सब आश्रवों को घटा देना। चैबीस घंटे मौन रहकर के अपनी ध्यान, साधना करना। पौषध यानि आत्मा को पौषण करना। चैबीस घंटे ब्रह्मचर्च का पालन करना, संसार के कार्य से भी निवृत होकर मात्र एक आत्मार्थी साधक बनकर स्वाध्याय और ध्यान में लीन रहने की साधना है।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘बरसा दाता सुख बरसा, आंगन-आंगन सुख बरसा’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया कि संसार में ऐसा कोई आदमी नहीं होगा जो तृप्त होकर मरता है। चाहे उसे कितना ही धन दौलत मिल जाए तो भी उसकी इच्छाएं पूर्ण नहीं होती है। मनुष्य पांच इन्द्रियों की कामनाओं को पूरा करने में ही अपना पूरा जीवन लगा देता है।

आज श्री अनिल मेहता ने 10 उपवास के प्रत्याख्यान लिये। ऑनलाइन के माध्यम से पूर्वी हितेश मेहता ने 23 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किये।
आज की सभा में शिवाचार्य आत्मध्यान फाउण्डेशन नाशिक में सम्पन्न हुए दस दिवसीय शिविर के साधकों ने अपनी साधना को पुष्ट करने के लिए मार्गदर्शन भी प्राप्त किया।

- आचार्य शिवमुनि

संयम व विवेक पूर्वक साधना करने वाला संसार सागर को पार करता है

- श्री शिरीष मुनि जी म.सा.

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