आकार में निराकार है आत्मा |

30 AUGUST 2024

ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि आकार में निराकार आत्मा है। इन्द्रियां व मन के पार अष्ट गुणों से युक्त आत्मा है। वह तुम हो। उसे केवल देखो और जानो। वह आत्मा सबमें समान है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने म.सा. ने उद्बोधन में फरमाया कि धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश अदृश्य रूप से हमें सहयोग दे रह हैं, लेकिन पुद्गल के साथ हम संबंध बना लेते हैं, विभाव में जाकर राग और द्वेष करते हैं। जिससे हमारा संसार खड़ा होता है। अज्ञान और मिथ्यात्व के कारण हम सभी इन पुद्गलों को अपना मानते हैं और पुद्गलों के साथ आसक्त हो जाते हैं। पुद्गलों को लेकर अच्छा और बुरा मान लेते हैं। पुद्गलों में सुख ढूंढते हैं लेकिन पुद्गलों में सुख है ही नहीं ।

आज तक हमने सुख कहां देखा चाहे इस भव में देखो चाहे अनंत की यात्रा में देख लो। हमने सुख पुद्गलों की अनुकूलता में ढूंढा। चाहे वह शब्द है। शब्द आपके अनुकूल मिले तो आप खुश हो जाते हो और यदि आपकी धारणा के विपरीत कोई शब्द कह देता है तो आप आर्त-रौद्र ध्यान में चले जाते हो। ऐसे ही रूप आपकी धारणा के अनुसार मिले तो प्रसन्न हो जाते हो और धारणा के विपरीत मिले तो अपने भाव बिगाड़ लेते हो विभाव में चले जाते हो।

उन्होंने फरमाया कि शब्द, वर्ण, रस, गंध, स्पर्श इन सबको लेकर हमने विभाव में जाकर कर्म का बंधन किया। तत्व को जानकर के पुद्गल को पुद्गल मानना है पुद्गल का उपयोग करना है, इस तत्व के रूप में है सहयोगी लेकिन इसे अपना नहीं मानना है। इसको लेकर के विभाव में नहीं जाना है यही इस तत्व को पाना मूल सार है।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आओ भगवन आओ इस अंतर मन में आओ’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया कि धर्म की शुरूआत दान से होती है। मोक्ष महल के चार प्रवेश द्वार हैं, जिनमें सर्वप्रथम है दान। जैसे बिना नींव के महल टिक नहीं सकता है वैसे ही बिना भावना के दान, शील और तप की सार्थकता नहीं हो सकती।

आज की सभा में दिल्ली, अम्बाला केन्ट (हरियाणा), नाशिक, सूरत आदि जगहों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पधारे।

- आचार्य शिवमुनि

पुद्गलों में सुख नहीं |

- श्री शिरीष मुनि जी म.सा.

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