व्यर्थ की दौड़ से बचने के लिए दिशा की मर्यादा करें |

28 AUGUST 2024

ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में तीन गुणव्रत की चर्चा करते हुए फरमाया कि भगवान महावीर ने बारह व्रतों में छठा दिशा-परिमाण व्रत का स्वरूप निरूपण किया है। जैन ग्रन्थों ने अत्युच्च चिन्तन दिया कि हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, परिग्रह के दोष से बचने के लिए व्यक्ति के जीवन में दिशाओं की मर्यादा रहनी चाहिए। दिशाएं चार हैं। यदि हम अधः और ऊध्र्व दिशा को सम्मिलित करें तो दिशाएं छः बन जाती हैं। यदि हम दिशाओं के बीच के कोणों को भी ले लें तो दिशाएं दस बन जाती हैं।

उन्होंने फरमाया कि यदि आप दिशा-परिमाण व्रत ले लेंगे, फिर चारों दिशाओं, ऊपर-नीचे और विदिशाओं में इतनी दूर तक जाना है, उसके आगे नहीं जाना इस प्रकार दिशाओं का परिमाण यानि मर्यादा हो जाएगी। एक लक्ष्मणरेखा आपने खींच ली। उसके आगे आप नहीं जाएंगे क्योंकि आपने स्वयं को मर्यादा में बांध लिया। इसका परिणाम यह होगा कि उतनी दौड़-धूप समाप्त हो जाएगी। उन क्षेत्रों में जो हिंसा हो सकती है, झूठ बोलने की स्थिति बन सकती है या चोरी, व्यभिचार, अनाचार की स्थिति बन सकती है, अनुचित संबंध बन सकते हैं, उस पर रोक लग गई, नियंत्रण हो गया।

उन्होंने फरमाया कि दिशाओं की मर्यादा करने के पीछे पांच व्रतों के सम्यक पालन का उद्देश्य है। व्यक्ति के हर कृत्य का सम्बन्ध स्थान से रहता है। जब स्थान सीमित होगा, मर्यादित होगा तो अन्य प्रकार के पापों से वह बच जाएगा। व्यर्थ की दौड़ धूप नहीं करेगा, परेशान नहीं होगा, जिन्दगी में संतोष से रहेगा और अंतिम समय उत्तम आ सकेगा। समाधिपूर्वक अपने शरीर को छोड़ेगा। अच्छी गति प्राप्त कर सकेंगा। इस दृष्टि से श्रावक, राजाओं, बड़े-बड़े लोगों के लिए इस प्रकार की मर्यादा बनाई गई है कि वे अपने जीवन में दसों दिशाओं की मर्यादा बनाकर रखें और अपने जीवन को संतोषी बनाकर चलें।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन में देव गति के आयुष्य बंधन की चर्चा करते हुए फरमाया कि देवगति में भी सुख नहीं है, भ्रम जितना टूटेगा तो वास्तविक सुख मिलेगा, वास्तविक सुख आपके पास है उसके लिए आप स्वतंत्र है। सुख आत्मा में है।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘दुनिया में आने वाले नेकी क्यों दिल से भुलाई’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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