आत्म शांति आत्म विकास में बाधक है-परिग्रह |

27 AUGUST 2024

ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान महावीर ने परिग्रह को सबसे बड़ा पाप कहा है क्योंकि यह आत्मशांति और आत्मविकास में बाधक है। परिग्रहशील व्यक्ति के अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व्रत कभी सुरक्षित नहीं रहते। परिग्रह इकट्ठा करते समय ही ये सारे व्रत टूट जाते हैं।

भगवान महावीर ने कहा-न्याय-नीति के मार्ग पर चलकर भले आप अरबपति बन जाएं, किसी को कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु अन्याय, अनीति करके, दूसरे के अधिकार छीनकर, दूसरों को उनकी आवश्यकताओं से महरूम करके यदि आप ऊंचे उठते हैं तो वह आपका विकास अंत में जाकर विनाश बनेगा।

भगवान महावीर के सिद्धान्त जीवन और समाज के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। भगवान महावीर के सिद्धान्तों पर चलकर ही सारी दुनिया को शांति मिल सकती है। ये सिद्धान्त केवल वैयक्तिक नहीं हैं, ये स्वर्णिम सिद्धान्त हैं। सारे विश्व के लिए ये उपयोगी हैं। वक्त आने पर शांति पाने के लिए भगवान महावीर के इन सिद्धान्तों की शरण में दुनिया को आना ही पड़ेगा। आप यह मत समझिए कि गरीबों को तड़पाकर या उन्हें उनकी आवश्यकताओं से वंचित रखकर आप सुखी रह सकते हैं, आप कदापि सुखी नहीं हो सकते। आगे जाकर आपका यह सुख दुःख में बदल सकता है। सामाजिक व्यवस्था को ठीक रखने के लिए भी अपरिग्रह का सिद्धान्त अत्यंत उपयोगी है। अतः आपके पास जो कुछ है, आप इसकी मर्यादा करें।

उन्होंने यह भी फरमाया कि जैसे-जैसे लाभ होता है, वैसे-वैसे लोभ होता है। लाभ से लोभ बढ़ता जाता है। ज्यों-ज्यों तृण व काष्ठ अग्नि में डाले तो उसको तृप्ति नहीं होती अनेक नदियों के मिलने पर भी समुद्र को तृप्ति नहीं होती, वैसे ही संसार का सर्वस्व भी किसी एक व्यक्ति को मिल जाए तो भी उसे तृप्ति का अनुभव नहीं होता।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन वैमानिक देवों की चर्चा करते हुए फरमाया कि दो प्रकार के वैमानिक देव होते हैं- कल्पोपपन्न और कल्पातीत। कल्पोपपन्न अर्थात् बारह स्वर्गों में उत्पन्न होने वाले देव और कल्पातीत अर्थात् नौ ग्रैवेयको और पांच अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होने वाले देव हैं।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आजा रे आजा द्वारा प्रभु के’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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