ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि प्रभु महावीर की वाणी, प्रभु महावीर का ज्ञान, प्रभु महावीर की मैत्री आज भी विश्व में शांति प्रदान करती है, आज भी हम संसार सागर से पार हो सकते हैं आज भी हम अंधकार से प्रकाश, मिथ्यात्व से सम्यक्त्व की ओर जा सकते हैं, आज भी हम उनकी वाणी का अनुसरण करके सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो सकते हैं। प्रभु सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो गये किंतु आज भी उनकी वाणी, उनका ज्ञान, उनकी साधना, उनकी मैत्री आज भी हमारे पास है।
उन्होंने महावीर की साधना के बारे में फरमाया कि महावीर की सारी साधना जीव की रही। महावीर राजकुमार थे, राजा के बेटे थे, शादी हुई, बेटी हुई, वैराग्य आया, सबकुछ छोड़कर जंगल में चले गये। तीस वर्ष की उम्र में एकांत, मौन को चुना। साढ़े बारह वर्ष की साधना में उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की। किसी ने नाम पूछा तो केवल इतना बोले मैं भिक्षु हूं।
उन्होंगे आगे फरमाया कि दीक्षा लेने के बाद जहां ठहरे वो कुलपति महाराज सिद्धार्थ का मित्र था। महावीर एक झौपड़ी में ठहरे, अकाल पड़ गया, गाय घास खाने लगी। कुलपति ने महावीर से कहा एक पक्षी भी अपने घोंसले के लिए जी जान लगा देता है तुम क्षत्रिय पुत्र होकर भी अपने आश्रय स्थान की रक्षा नहीं कर सकते। महावीर वहां से प्रस्थान कर गये। उस समय उन्होंने पांच संकल्प लिये भविष्य में अप्रीतिकारक स्थान में नहीं रहूंगा, ध्यान में सतत लीन रहूंगा, सदा मौन रहूंगा, हाथ में भोजन ग्रहण करूंगा, गृहस्थ का विनय नहीं करूंगा।
उन्होंने यह भी फरमाया कि आप जीवात्मा हैं स्वयं को मात्र एक जीव के रूप में जानें। देह की दृष्टि से अनेकों भेद पर आत्मा की दृष्टि से कोई भेद नहीं। जो गुण और धर्म जीव के हैं वही गुण और धर्म अन्य जीवों में है। जो जीव अपने आपको जानकर अपने को समय देगा, अपने आप में ठहर जाएगा, वह सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो जाएगा।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन में जो आत्मा के अस्तित्व को मानते हैं, श्रद्धा करते हैं, वो लोक को भी मानते हैं, जो लोक को मानते हैं वो कर्म को मानते हैं और जो कर्म को मानते हैं वो क्रिया को मानते हैं।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘क्षणभंगुर है जीवन तेरा क्या तूने ऐसा सोचा’’ भजन की प्रस्तुति दी।
प्रवचन में बैंगलोर, राजपुरा, दिल्ली, मुंबई आदि जगहों से गुरु भक्त पधारे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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