ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने चार दिवसीय ऑनलाइन धर्म ध्यान शिविर का शुभारंभ करते हुए प्रथम दिवस पर शिविरार्थियों को संबोधित किया। अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि सभी तीर्थंकरों की वाणी का एकमात्र उद्देश्य है कि जीव स्वयं को पहचाने। उन्होंने कहा, “तुम कौन हो? मनुष्य जीवन में आते ही लोग परिवार, समाज, रिश्तेदारों, पद-प्रतिष्ठा, और धन-संपत्ति में उलझ जाते हैं। यह जीवन हमें अनंत बार मिला है, लेकिन इस बार हमें इसका महत्व समझना होगा। इस पंचम काल में हमें अरिहंत प्रभु की वाणी सुनने का सौभाग्य मिला है। अब हमें अपने जीवन का लक्ष्य पहचानना है और उस दिशा में आगे बढ़ना है।”
आचार्य शिवमुनि जी ने कहा, “आप जीवात्मा हैं और आपको स्वयं को जीव के रूप में जानना होगा। इस काया में आपका विस्तार है, और यह विस्तार सिर के सिरे से पांव के अंगूठे तक है। आत्मा को महसूस किया जा सकता है, लेकिन इसे देखा या सुना नहीं जा सकता। आत्मा की गंध नहीं होती, इसका स्वाद नहीं होता, और इसका स्पर्श भी नहीं होता। आत्मा की दृष्टि से सभी जीव समान हैं, और इस समानता का अनुभव करना आवश्यक है। जो जीव अपने आपको जान लेता है और आत्मा में स्थिर हो जाता है, वह संसार की यात्रा सीमित करते हुए अंततः मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।”
उन्होंने मौन की महत्ता पर जोर देते हुए कहा, “जितना अधिक मौन रखेंगे, उतना ही भीतर जाने का लाभ मिलेगा। आपको आत्मिक सुख का अनुभव करना है, अपने में रमण करना है, जिससे अनंत आनंद और शांति की प्राप्ति होगी।”
इससे पहले मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने कहा कि जब तक व्यक्ति को सत्य का बोध नहीं होता, तब तक वह मिथ्यात्व में रहता है। मिथ्यात्व के कारण कर्म बंधन निरंतर चलते रहते हैं, जबकि आत्मा अष्टगुणों से संपन्न है।
ऑनलाइन ध्यान शिविर का प्रारंभ दैनिक प्रवचन से पहले हुआ, जिसमें नाशिक, कुप्पकला, चैन्नई, वीर नगर दिल्ली, और उदयपुर के शिविरार्थियों ने भाग लिया। शिविर के दौरान, शिविरार्थियों ने अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया और आत्मिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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