श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि क्रोध ऐसी चिंगारी है जो जन्मों-जन्मों के पुण्य को समाप्त कर देती है। संसार का मूल कर्म है, और कर्म का मूल कषाय है। क्रोध, मान, माया, और लोभ में सबसे भयंकर क्रोध है।
उन्होंने आगे कहा कि जब व्यक्ति को क्रोध आए तो उसे शांत रहना चाहिए। यदि क्रोध में कुछ कह दिया जाए, तो उसे क्षमा मांग लेनी चाहिए। क्रोध के समय व्यक्ति का चेहरा भी लाल हो जाता है, वह अपना आपा खो देता है, और क्रोध के कारण उसका स्वभाव झगड़ालू प्रवृत्ति का हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका जीवन दुःखमय बन जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सभी तीर्थंकरों की वाणी एक समान है। जीव अनादिकाल से भ्रमण कर रहा है। कभी सोचो और विचार करो कि हम संसार में कब से आ रहे हैं। चार गति और चौरासी लाख जीव योनियों से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है कि जीव अपने स्वभाव में आए। एक विभाव है और दूसरा है स्वभाव। विभाव में कर्मों का बंधन होता है और स्वभाव में कर्मों की निर्जरा होती है। क्रोध कब आता है? जब मनुष्य विभाव में होता है। स्वभाव में रहने वाले को क्रोध नहीं आ सकता।
उन्होंने सत्य को शुद्ध धर्म बताते हुए कहा कि मनुष्य जब भोजन करता है तो सबसे पहले उसमें भोजन बनाने वाले के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। भोजन करते समय यह भावना होनी चाहिए कि अगर कोई साधु-संत आए, तो मैं उन्हें भोजन दान दूं और उसके पश्चात ही भोजन करूं। ऐसी शुद्ध भावना से व्यक्ति अपने मानव जीवन को कल्याणकारी बना सकता है।
इससे पूर्व ‘मधुर गायक’ श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने क्रोध क्या है, क्रोध उत्पन्न होने के पाँच कारण और क्रोध पर कैसे विजय पायें, इस विषय पर अपना उद्बोधन दिया।
श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘मनवा रे मनवा पुण्य उदय से मानव भव है पाया’’ और श्री शौर्य मुनि म.सा. ने ‘‘अरिहंतों ने कृपा करके शिवधारा से जोड़ दिया’’ भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर सचिन (सूरत) से सुश्री भावना भटेवरा (सुपुत्री श्री रोशनलाल) व श्री मोहनभाई देरासरिया ने तेले की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।
इस अवसर पर राणियां, मैसूर, भीलवाड़ा, जम्मू आदि जगहों से गुरुभक्त दर्शन के लिए उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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