

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता दिवस पर अपने उद्बोधन में कहा कि स्वतंत्रता संग्राम का महायज्ञ महर्षि दयानंद सरस्वती ने प्रारम्भ किया था। देखते ही देखते यह चिंगारी एक महासंग्राम में बदल गई, जिसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि देश की स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गए। लोकमान्य तिलक ने “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे हम लेकर ही रहेंगे” का सिंहनाद किया, और सुभाष चंद्र बोस ने कहा – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।” लालबहादुर शास्त्री के “जय जवान, जय किसान” नारे ने देश के सैनिकों और किसानों में एक नई उमंग और नया जज्बा भरने का काम किया। 90 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली।
उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि सुभाष चंद्र बोस एक बार भीड़ को संबोधित कर रहे थे, तभी किसी व्यक्ति ने उन पर जूता फेंका। सुभाष बाबू ने बिना विचलित हुए अपना भाषण जारी रखा और कहा – “जिन सज्जन ने एक जूता मेरी ओर फेंका है, वे कृपया दूसरा जूता भी फेंकने का कष्ट करें, ताकि वह मेरे पहनने के काम आ सके।” इतनी उनमें सहनशीलता थी।
उन्होंने आगे कहा कि जब बच्चे बड़े होते हैं, तो उन्हें नियम, अनुशासन में बंधकर रहना सिखाना और उन्हें शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक तौर पर मजबूत बनाना न सिर्फ उनके भविष्य के लिए, अपितु समाज के उत्थान के लिए भी अच्छा होता है। मनुष्य अपनी इन्द्रियों, वृत्तियों, आकांक्षाओं, भावनाओं, इच्छाओं, और तृष्णाओं का दास है। जब तक व्यक्ति का अंतरंग अस्तित्व स्वतंत्र नहीं होता, तब बाह्य स्वतंत्रता का मोल नहीं हो सकता। संसार में जन्म लिया है तो संसार में रहना ही है, पर हमें यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि हम भले ही संसार में रहें, संसार हमारे भीतर न बस जाए। कमल का अस्तित्व कीचड़ से है, पर कीचड़ कमल पर नहीं आना चाहिए। यदि कीचड़ कमल पर आ गया, तो कमल का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसी तरह, व्यक्ति को संसार के दलदल में रहते हुए अपनी आत्मा का भी ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि हमारे जीवन में यह खोज होनी चाहिए कि मैं कहां-कहां बंधनों में जकड़ा हुआ हूं, किन आसक्तियों से घिरा हुआ हूं। आज स्वतंत्रता दिवस पर हम भी अपनी अंतर स्वतंत्रता के लिए संकल्प लें। अच्छाइयों को अपनाएं, बुराइयों को त्यागें। धर्म का सार यही है कि जो आप अपने लिए चाहते हो, वही सारे संसार के लिए चाहो। जो आप अपने लिए नहीं चाहते, वह किसी के लिए मत चाहो।
‘मधुर गायक’ श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने “जहां जन-जन में बहती हो, समता की निर्मल धारा” भजन की प्रस्तुति देते हुए वाणी संयम के बारे में अपना उद्बोधन दिया। श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने “मन मंदिर में पधारो भगवन, भक्ति हमारी स्वीकारो” भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर दिल्ली से 35 व्यक्तियों का संघ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुआ। दिल्ली से आए संघ की ओर से श्री राजीव जैन ने अपनी भावनाएं व्यक्त की।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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