किसी मालिक, स्वामी की वस्तु को उसकी बिना इजाजत के शारीरिक बल, बुद्धिबल अथवा चतुराई से अपनी शक्ति और प्रभाव का प्रयोग करके उसकी वह चीज ले लेतें लेते हैं जिसे भगवान महावीर ने चोरी का नाम दिया है। चोरी के दो रूप हैं सूक्ष्म और स्थूल। घर में व्यक्ति बिना पूछे एक दूसरे की वस्तु का उपयोग अपना अधिकार समझकर करते हैं। सूक्ष्म परिभाषा के अनुसार तो यह भी चोरी है, किन्तु व्यवहार जगत में यह चोरी या अपराध नहीं होता। दूसरे प्रकार स्थूल चोरी में ताला तोड़कर चोरी करना बड़ी चोरी है। श्रावक को स्थूल चोरी का त्याग करना चाहिए।’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाये।
उन्होंने चोरी के प्रकारों का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करता है उस क्षेत्र को हड़पने की कोशिश करता है तो क्षेत्र की चोरी कहा जाता है। यदि कोई पढाने वाला अध्यापक विद्यार्थी को निर्धारित एक घंटे पढ़ाना होता है किंतु वह 45 मिनट ही अध्ययन कराता है तो वह काल की चोरी की श्रेणी में आता है। किसी दूसरे व्यक्ति के लेख को चुराकर अपना नाम दे देता है तो वह भावों की चोरी कही जाती है। गाड़ी में बिना टिकट के सफर करना चोरी ही है। एक श्रावक श्रेष्ठ श्रावक के लिए चोरी के विचार मात्र से पाप का बंधन होता है।
उन्होंने अस्तेय अणुव्रत के पांच अतिचार बताये चोरों का उपयोग करना, चोर की चुराई वस्तु को लेना, देश हित में कानून हो अपने स्वार्थ के लिए उसका विरोध करना, कम तोल-माप करना, मिलावट करना आदि इनसे बचना चाहिए।
उन्होंने पुणिया श्रावक के प्रसंग का उल्लेख करते हुए फरमाया कि पुणिया श्रावक की तरह सामायिक होनी चाहिए। अपने जीवन में अवलोकन करना है, कि जीव व्यवहार में कहीं कोई अदत्त वस्तु (चोरी) तो नहीं आई है, अगर ऐसा है तो सावधान रहकर, अदतादान से दूर रहना चाहिए जिससे शुद्ध चेतना का विकास हो।
मधुर गायक’ श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘क्षण भंगुर है जीवन तेरा क्या ऐसा तूने सोचा है’’ एवं श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जाग चेतन… जाग चेतन स्वयं को पहचान’’ भजन की प्रस्तुति दी। शौर्य मुनि जी म.सा. ने अपना उद्बोधन दिया।
इस अवसर पर जालन्धर से ‘‘विमल विवेक’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री संजय जैन, मन्दसौर से श्रीमती शशि मारू, बिजापुर (महेसाणा), बैंगलोर आदि जगहों से गुरु भक्तों ने प्रवचन श्रवण का लाभ लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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