‘‘मन की चंचलता के कारण व्यक्ति भटकता रहता है, मन को एक विचार दे दिया जाए तो वह उस विचार की गहराई तक पहुंच जाएगा। मन घोड़े की तरह शक्तिशाली है, जिस तरह से घोड़े को नियंत्रण में रखने के लिए लगाम जरूरी है उसी तरह मन के नियंत्रण के लिए मन को साधना जरूरी हैै। पानी हमेशा नीचे की ओर बहता है उसी तरह व्यक्ति को मन नीचे की ओर ले जाता है, इसलिए मन को साधना महत्त्वपूर्ण है।’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. श्री शिव मुनि जी म.सा. ने शुक्रवार को अपने उद्बोधन में फरमाये।
उन्होंने आगे श्रावक के व्रतों की चर्चा करते हुए फरमाया कि श्रावक के बारह व्रत होते हैं और पांच महाव्रत साधु के लिए होते हैं। देव, गुरु और धर्म पर श्रद्धा करने वाला श्रावक है। श्रावक संतों के प्रवचन सुनता है और साधु-संतों की सेवा उपासना भी करता है वह भोजन आदि का दान भी देता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि व्यक्ति का ज्ञान दीपक के समान होता है जो अंधेरे में रास्ता दिखा सकता है किंतु मंजिल तक पहुंचने के लिए स्वयं को चलना पड़ता है। व्यक्ति धीरे-धीरे अपने कदम आगे बढ़ाता है तो वह अपनी मंजिल तक पहुंच जाता है। इसी प्रकार चारित्रवान साधक अपनी साधना के द्वारा धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का विवेचन करते हुए फरमाया कि जीव शरीर छोड़कर जब गति करता है तो वह आत्म प्रदेशों का योग और कार्मण दोनों के साथ रहता है इसके अलावा वह अपने साथ यहां का कोई पुद्गल लेकर नहीं जाता है। व्यक्ति अनावश्यक ही पुद्गलों की चिंता करता रहता है जो मुक्ति के लिए बाधक है।
श्रमण संघीय सहमंत्री युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘न मैं धाम धरती न धन चाहता हूं’’ भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर ‘आत्मार्थी’ श्री शौर्य मुनि जी म.सा. ने 7 दिन के उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। इसी क्रम में कामरेज (सूरत) के श्री राहूल लोढ़ा ने 11 दिन के उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान किया, जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शाॅल, माला द्वारा सम्मान करते हुए ‘तपस्या करने वालों को धन्यवाद-धन्यवाद’ के साथ अभिवादन किया।
इस अवसर पर लुधियाना, चैन्नई, आणंद, कामरेज आदि स्थानों से श्रावक-श्राविका उपस्थित थे |
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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