जैन सिद्धांत है वैज्ञानिक सिद्धांत

6 AUGUST 2024

आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि जैन दर्शन की मान्यता के अनुसार व्यक्ति जब सिद्धशिला में चला जाता है तो उसका दुबारा किसी जीव योनि में जन्म नहीं होता। जैन सिद्धांत अनूठा वैज्ञानिक सिद्धांत है। केवल ज्ञानी भगवान ने अपने ज्ञान से देखा यह पूरा अढाई द्वीप का लोक, अधोलोक, मध्यलोक, ऊध्र्वलोक और सबसे ऊपर 45 लाख योजन की सिद्धशिला में अनेक सिद्ध पुरुष विराजमान हैं।

उन्होंने आगे फरमाया कि मनुष्य अपने जन्म-मरण के चक्र का अंत कर सकता है और वह सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र के द्वारा सिद्ध शिला को अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। जहां तप है वहां चरित्र स्वतः ही समावेश हो जाता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक आचरण जिस पर जैन दर्शन टिका हुआ है।

उन्होंने यह भी फरमाया कि सम्यक अर्थात आचरण करने योग्य है केवल लिखना-पढ़ना नहीं, अंतर से आवाज आनी चाहिए। ज्ञान से मनुष्य जानता है, दर्शन से श्रद्धा करता है, चरित्र से निग्रह करता है और कर्मों को क्षय में कर लेता है, तप से शुद्धि करता है। ज्ञान आत्मा का स्वभाव है जैसे सुख आत्मा का स्वभाव है, दर्शन भी आत्मा का स्वभाव है। जिस तरह से एक हिरण की नाभि में कस्तुरी होती है और वह हिरण उस कस्तुरी की सुगंध के कारण वन में भटकता रहता है, किंतु उसे यह पता नहीं कि उसकी नाभि के भीतर ही वह कस्तुरी है, इसी तरह मनुष्य की आत्मा के भीतर ही सुख है किंतु वह बाहर ढूंढता रहता है। व्यक्ति सम्यक ज्ञान के द्वारा सुख को प्राप्त कर सकता है।

श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का विवेचन करते हुए फरमाया कि व्यक्ति जड़ और जीव को जानते हुए भी राग-द्वेष के कारण बंधन में बंधा हुआ है, यदि उससे मुक्त होना है तो वैराग्य की ओर अग्रसर होना होगा। व्यक्ति को जितना वैराग्य आता है, उतना ही उसका मोह कम होता जाता है।

श्रमण संघीय सहमंत्री युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘मुक्ति को पाने की खातिर होवें अंतरध्यान’’ भजन की प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर स्थानीय श्रावकों के अलावा चिदम्बरम (चेन्नई), पूना (महाराष्ट्र) से श्रावकगण विशेष रूप से उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

For causes
that really matter