


उपरोक्त विचार श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं के मध्य व्यक्त किए हैं। उनका संदेश धार्मिक और नैतिक शिक्षा पर केंद्रित है, जिसमें उन्होंने पंचेन्द्रिय प्राणी की हत्या और मांसाहार के नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि झूठ, छल, और कपट के कारण व्यक्ति को पशु योनि में जन्म लेना पड़ता है, जहाँ उसे कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार, व्यक्ति को अपने दोषों को प्रकट करते हुए अंतःकरण से आलोचना करनी चाहिए जिससे पाप कर्म हल्का हो सकता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे कपड़े को साबुन से धोने से मैल धुल जाता है, वैसे ही पाप कर्म की अंतःकरण से आलोचना कर उसे धोया जा सकता है।
श्री शिवमुनि जी ने सरलता, सदाचार, और दयालुता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसा व्यक्ति मनुष्य जन्म प्राप्त करता है। उन्होंने देव गति के चार प्रकार बताए: भवनपति, वाणव्यंतर, ज्योतिष्क देव, और वैमानिक देव, और उनके गुणों और निवास स्थानों का वर्णन किया।
देवगति में जाने के चार कारण बताए गए हैं: सरागसंयम, संयमासंयम, अकाम निर्जरा, और बाल तप। आचार्य शिवमुनि जी ने इसके साथ ही संयम, श्रावक के विभिन्न प्रकार, और क्षायोपक्षमिक भाव के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
आचार्य शिवमुनि जी के सहमंत्री युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने आगामी 21 अगस्त से 24 अगस्त 2024 तक होने वाले ऑनलाइन आत्म ध्यान धर्मयज्ञ के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर ऑल इंडिया जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री संजीव जैन, संगठन मंत्री श्री राजन जैन, पंजाब प्रदेश अध्यक्ष श्री अरूण जैन, और अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे।
दिनांक 5 अगस्त को आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनन्द ऋषिजी महाराज साहब की जन्म जयंती सामूहिक आयंबिल दिवस के रूप में मनाई जाएगी, जिसमें देशभर में 1 लाख 25 हजार आयंबिल का आह्वान किया गया है।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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