संसार के सारे प्राणियों को प्यारा है अपना जीवन |

1 August 2024

आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी ने अपने उद्बोधन में तिर्यंच गति के जीवों की चर्चा करते हुए फरमाया कि तिर्यंच अर्थात तिरछे, टेढ़े-मेढ़े जीव, जिनमें कीट-पतंगे से लेकर हाथी तक के जीव शामिल होते हैं, जिनकी पीठ आकाश की ओर रहती है, वे जीव तिर्यंच गति में आते हैं। प्रायः तिरछे लोक में रहने वाले वे जीव, जहां नरक जितना दुःख नहीं, देव जैसा अधिक सुख नहीं और मनुष्य गति जैसा धर्म नहीं होता, ऐसी गति के जीव तिर्यंच कहलाते हैं। जल में रहने वाले जीव जलचर, स्थल पर विचरने वाले जीव स्थलचर, आकाश में उड़ने वाले जीव खेचर, छाती के बल चलने वाले जीव उरपुर जैसे सर्प, भुजपुर जैसे गिलहरी भुजाओं के बल चलती हैं – ये पांच प्रकार के जीव तिर्यंच में आते हैं। ये अपनी शक्तियों को पूर्ण करने से पहले मर भी जाते हैं। सूक्ष्म तिर्यंच सारे लोक में हैं।

उन्होंने त्रस जीवों का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि त्रस का अर्थ है जो हिलते हैं, आगे-पीछे आते जाते हैं, उन्हें गर्मी लगती है तो छाया में चले जाते हैं। सर्दी लगती है तो धूप में चले जाते हैं। मनुष्य को देखते हैं तो डर जाते हैं। त्रसित होकर अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर बिल आदि में छुप जाते हैं। उन्हें भी जीवन प्रिय है। इसी आधार पर भगवान महावीर ने कहा – सारे संसार के प्राणियों को जीवन प्यारा है। इसीलिए किसी जीव को मत मारो क्योंकि कोई मरना नहीं चाहता। सभी जीव जीवन में सुख चाहते हैं।

यदि कोई व्यक्ति अपने अज्ञान के कारण वनस्पति को चेतनाहीन समझकर उनका विनाश करेगा और यह समझेगा कि मैंने कोई पाप नहीं किया, इसका अर्थ यह है कि उसका यह पाप इसीलिए हो रहा है कि उसको जीव विज्ञान का पता नहीं है कि जीव की सत्ता इस लोक में कहां-कहां और किस-किस रूप में है? वह तो समझता है कि यह साधारण कर्म है, सारी दुनिया कर रही है, पर यह चिंतन सही नहीं है। व्यक्ति के व्यवहार, आचार, विचार और उच्चार में कितना दोष है? कितनी हिंसा है? कितना स्वार्थ है? यह उसे देखना है। यदि कहीं हिंसा है तो वह दुर्गति का कारण बनेगी। इसमें किसी का कोई लिहाज नहीं। किसी गरीब, अमीर, सम्राट, चक्रवर्ती का कर्म-साम्राज्य में कोई लिहाज नहीं होता। इसीलिए समझ लीजिए, आपकी गति का परिवर्तन कर्मों के अनुसार होता है। अज्ञान के कारण कहीं आपके जीवन में कोई गलत कार्य न हो जाए, इसीलिए जैन धर्म ने जीव की सूक्ष्म विवेचना दी है।

तिर्यंच गति में जाने के चार कारण हैं:

1. असत्य (झूठ) बोलने से
2. माया (छल, कपट) करने से
3. गूढ़ माया (अधिक छल, कपट) करने से
4. न्यूनाधिक (कम-ज्यादा) तोल-माप करने से।

जो लोग इस प्रकार के चार कर्म करते हैं, भगवान महावीर ने कहा कि वे तिर्यंच गति का बंध कर लेते हैं। यदि वे अंतिम समय में आलोचना न करें और उन्हीं लेश्याओं में शरीर को छोड़ दें तो वे निश्चय ही तिर्यंच गति में जाकर जन्म लेते हैं। एक बार यदि जीव इस चक्र में पड़ जाए तो उस गति से निकलना बहुत कठिन हो जाता है। आप मानव हैं। आपको प्रयत्न करना चाहिए कि इन दोषों को आप छोड़ें।

यदि जीव एक बार तिर्यंच गति में चला जाए, फिर इसके लिए मानव जीवन में आना बहुत कठिन होता है। शास्त्र ने इस पर अनेक उदाहरण दिए हैं और मानव को समझाया है कि इस जन्म में ऐसे कर्म नहीं करने चाहिएं जिनसे व्यक्ति को नरक तिर्यंच गति की प्राप्ति हो। इसलिए मनुष्य जीवन में आने के बाद उसे धर्म करना चाहिए।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिस तरह से एक व्यक्ति अपने घर में सेवादार को रखता है। सेठ की सेवा उसके पुत्र से ज्यादा वह सेवादार करता है, किंतु उसका मोह अपने बेटे के प्रति है न कि उस सेवादार के प्रति। इसी तरह व्यक्ति को अपने शरीर से ज्यादा अपनी आत्मा की ओर ध्यान देना चाहिए।

इस अवसर पर संगमनेर (महाराष्ट्र) से महिला मण्डल समूह व पूना से श्री अशोक चैपड़ा, श्री अजय चैपड़ा आदि अनेक व्यक्ति उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

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