बलेश्वर (सूरत), 30 जुलाई 2024। श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिव मुनि जी ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते अपने प्रवचन में फरमाया अज्ञान से प्रेरित होकर मोहनीय कर्म के प्रभाव से अशुभ कर्मवृत्ति उत्पन्न होती है। उससे व्यक्ति स्वार्थी बन जाता हैं। मनुष्य येन केन प्रकारेण स्वयं सुखी होने के लिए सोचता है और वह अपने लिए सुख के साधन एकत्रित करता है। चाहे दूसरे को कोई दुःख हो, दूसरे उन साधनों से वंचित हो जाएं। वह दूसरे के दुःख के लिए मन में दया भाव नहीं रखता। जब व्यक्ति में दया का स्रोत सूखता है तो व्यक्ति कठोर हो जाता है। स्वार्थ और मन की कठोरता व्यक्ति को दूसरे के सुख का चिन्तन नहीं करने देती। जिससे उसके जीवन में पाप का उदय हो जाता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जिसे दूसरे के दुःख की अनुभूति होती है कि अमुक व्यक्ति को ऐसा दुःख है। अमुक व्यक्ति परेशान है। अभाव में जी रहा है। उसके पास भोजन नहीं है, मकान नहीं है, कपड़ा नहीं है जब इस प्रकार दया का संचार होता है, तब व्यक्ति में शुभकर्म करने का भाव उत्पन्न होता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि व्यक्ति को अपने जीवन में 25 वर्ष की अवस्था तक विद्या अध्ययन करना चाहिए, 25 से 50 वर्ष की अवस्था तक धन अर्जन और 50 से 75 वर्ष की अवस्था में अर्जित धन को पुण्य कार्य में सद्उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने नौ प्रकार के पुण्य में अन्न दान, जल दान के महत्त्व को बताते हुए फरमाया कि भुखे को भोजन, प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना चाहिए, किसी को रहने या सोने के लिए स्थान देना, वस्त्र उपलब्ध करवाना, मन से शुभ भावना भावित करना, मधुर वचन बोलना, काया से सेवा करना एवं बुजुर्ग, वृद्ध, सन्त, समाज के बड़े लोग हैं, माननीय पूजनीय लोग हैं, अगर उन्हें व्यक्ति आकर हाथ जोड़ देता है, उनका सम्मान कर देता है तो भगवान महावीर ने कहा-यह हाथ जोड़ना भी पुण्य का कारण बन जाता है।
पुण्य के साथ यदि अहंकार रहे तो यह पुण्य कभी कषायों का कारण बन जाता है, अहंकार-क्लेश का कारण, अशांति का कारण, कर्मबंधन का कारण बन जाता है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ज्ञान के बिना व्यक्ति अंधा हैं चक्षु तो मिले लेकिन वह सत्य और असत्य का भेद नहीं कर पाता है। असत्य को सत्य मान लेता है और सत्य को गौण कर देता है उसे अज्ञानी कहते हैं। मन को आत्मा की ओर मोड़ दिया जाए, मन को वश में कर लिया जाए तो मनुष्य का कल्याण संभव है।
इस अवसर पर सूरत के कामरेज से हस्तीबहन ने 12 उपवास, सूरत के टीकमनगर से कांतिलाल जी भोगर ने 11 उपवास, वराछा से रेखा पितलिया 9 उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान किया, तपस्वियों का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से माला व शाॅल द्वारा स्वागत किया गया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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