‘‘बीज फुटकर धरती की गर्मी को सहनकर अंकुरित होता है और धीरे-धीरे वह वृक्ष का रूप धारण कर लेता है, उस बीज में वृक्ष समाया हुआ है इसी तरह आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति है, जिसे पुरुषार्थ, पराकर्म से प्राप्त कर सकते हैं। बीज में वृक्ष समाया हुआ है वैसे ही आत्मा में परमात्मा विद्यमान है’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिव मुनि जी ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।
उन्होंने आगे अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान के समवरण (धर्मसभा) में सब तरह के जीव आते हैं पर भगवान सभी में आत्मा के दर्शन करते हैं और आत्मा की बात करते हैं। यदि कोई व्यक्ति भोजन, अथवा भ्रमण आदि कोई भी क्रिया करता है उस समय वह अपने स्वयं में स्थित हो गया उसे पाप कर्म का बंध नहीं होता यदि जीव मन, वचन, कर्म, धारणा में चला जाता है तो कर्मों का बंध हो जाता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि मनुष्य पापों को छोड़ना चाहता है अशुभ कर्म के कारण उसे छोड़ता नहीं है। इस दुनिया में सुख-दुःख, शांति-अशांति मानव के साथ लगी रहती है। जीवन सुख-दुःख का मिश्रण है। कहीं पुण्य कहीं पाप है। दुःख का मूल कारण है मिथ्यात्व व कषाय और ये ही कर्म के बीज हैं।
उन्होंने मोहनीय कर्म का विशलेषण करते हुए बताया कि मोहनीय कर्म का फल दो रूपों में है जिसे दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय कहते हैं। दर्शन मोहनीय अज्ञान पैदा करता है, मिथ्यात्व पैदा करता है। उसे ज्ञान नहीं होने देता। चारित्र मोहनीय कषाय पैदा करता है जिसे काम, क्रोध, मान, माया और लोभ भी कह सकते हैं।
उन्होंने यह भी फरमाया कि वर्षा के दौरान या जहां पानी गिरता रहता है ऐसी जगहों पर मकान की दीवारों या कुएं के पास बीज बोये बिना ही कभी-कभी पीपल के वृक्ष पैदा हो जाते हैं। जहां मिट्टी में बीज रहता है और उसे बाहर के निमित्त मिलते हैं, वहीं से वह बीज अंकुरित हो जाता है और वह वृक्ष के रूप में पुष्पित और पल्लवित होकर आपके सामने आ जाता है। व्यक्ति के अंदर संस्कारों के रूप में पाप हैं, मिथ्यात्व और कषाय हैं। पाप के कारण व्यक्ति आत्मा को ऊंचाइयों पर नहीं ले जा पाता है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति को जब विपरित परिस्थिति में धोखा मिलता है तब उसे ज्ञान होता है कि जिसे मैं अपना समझ रहा था वह मेरा नहीं है यह उसका केवल भ्रम ही था।
इस अवसर पर सूरत, मुंबई, अहमदाबाद, डबवाली, पटियाला, जैतो आदि स्थानों से भक्तगण उपस्थित हुए
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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