




आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जल, अग्नि, पृथ्वी, वनस्पति में भी मनुष्य की तरह जीव होता है। जीव की उपस्थिति में ही वनस्पति जगत में बीज से एक वृक्ष का निर्माण होता है। एक छोटा सा बीज भूमि से निकलकर ऑक्सीजन, पानी, खाद आदि से विशाल वटवृक्ष बन जाता है। इसी प्रकार पानी में जीव की उपस्थिति होती है। एक व्यक्ति अपने शरीर की सफाई के लिए पानी उपयोग लेता है। एक बाल्टी पानी से भी काम चल जाता है लेकिन अनावश्यक पानी का दुरुपयोग अपनी देह के लिए करता है तो बंधन है। संयम पूर्वक पानी का जितनी आवश्यकता है उतना उपयोग करता है तो वह कर्म बंधन को कम कर सकता है। इसी प्रकार घर में जब रसोई बनती है तो रसोई बनाने वाली बहनें बर्तनों को अच्छी तरह से देखकर कि कहीं कोई जीव-जन्तू तो नहीं है, विवेक पूर्वक रसोई बनाती है और यह भावना करती है मैं रसोई बना रही हूं कोई भी मेहमान या साधु-संत आए और मेरी रसोई से बने हुए भोजन से कुछ आहार दान करूं तो कर्मों का बंधन नहीं होता है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि मां के द्वारा बच्चों को गर्भ से ही संस्कार दिये जाते हैं तो बच्चे का जीवन भी उसी अनुरूप होता है। घर में एक कमरा ऐसा होना चाहिए जहां ध्यान स्वाध्याय आदि परिवार के सभी सदस्य एक साथ कर सकें। छोटे बच्चों में चंचल स्वभाव के कारण ध्यान नहीं लगता है तो प्रारंभ में मूल नाभि केन्द्र पर हाथ रखकर आते-जाते श्वांस को देखने का अभ्यास कराएं और स्पंदन को महसूस करें। सारा नाड़ीतंत्र नाभि केन्द्र पर होता है। व्यक्ति की नाभि का विशेष महत्त्व है कोई भी घटना घटती है तो नाभि पर स्पंदन होता है। जन्म के समय वह माता की नाभि से जुड़ा होता है और जब जन्म के बाद पेट से बाहर आता है तो माता की नाभि से अलग कर दिया जाता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि जो शिष्य गुरु से शिल्प कला सीखते हैं या अन्य कला बाहर जाकर सीखते हैं तो उस समय भी उन्हें कुछ विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, पुराने समय में राजकुमार भी जब विद्या अध्ययन के लिए जाते तो उसे भी गुरु के कठोर अनुशासन में रहना पड़ता, विद्या में निपूणता के लिए कठोर दण्ड को भी सहन करना पड़ता है। इसलिए दृष्टांत के अनुसार जो शिष्य विनम्रता के साथ गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है वह बोधि को प्राप्त करता है।
युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘पायो जी मैंने आत्म दर्शन पायो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज कामरेज सूरत से श्री धनराज ओस्तवाल ने 31 उपवास, त्रिकमनगर से जैन संस्कार मंच के अध्यक्ष श्री शंकरलाल सिंयाल ने 21 उपवास, श्रीमती मनिषा सुरेश जी संचेती ने 7 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। तपस्वियों का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शॉल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा स्वागत सम्मान किया।
एक दिवसीय एवं चार दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर सम्पन्न – आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में दिनांक 14 अगस्त से 17 सितम्बर 2024 तक आयोजित एक दिवसीय एवं चार दिवसीय ऑनलाईन शिविर आज सम्पन्न हुआ। कुपकला (पंजाब) में 29 एवं नाशिक (महाराष्ट्र) 43 आत्मार्थी साधकों ने इस शिविर में लाभ लेकर जीवन जीने की कला सीखते हुए सम्यक्त्व की ओर आगे बढ़ने का पुरुषार्थ किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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