संसार में भटकने का कारण आत्म तत्व को भूलना |

- आचार्य शिवमुनि

19 August 2026

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने फरमाया शरीर को आत्मा समझने के अनादिकाल के भ्रम के कारण संसार चक्र में घूम रहे हैं। आत्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है वह न कोई पुरुष, न कोई स्त्री, न कोई बालक, न कोई वृद्ध, न कोई जाति, न कोई परम्परा, न एक हूं, न बहुत हूं, निर्विचार, चैतन्य स्वरूप मैं शाश्वत सत्य आत्मा ही रहूंगा यही अटल सत्य है।

आचार्य भगवन ने फरमाया कि संसार में उलझने का कारण आत्मा जो सत्य तत्व है उसे हम भूल गए। आत्म प्रदेशों का स्वसंवेदन ज्ञान होता है कि मैं अपनी ही आत्मा के द्वारा अनुभव करता हूं वह मैं हूं। सिद्धों, अरिहंतों के समान आत्मा हूं। आज तक शरीर को महत्व दिया, अब केन्द्र बिन्दू आत्मा को बनाना है। जब व्यक्ति आत्म तत्व में आ जाता है तो क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं होती।

आचार्य भगवन ने छोटे बच्चों को भी ध्यान करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि छोटे बच्चों को भी ध्यान का प्रयोग करवाना चाहिए। सबसे पहले वे आते-जाते श्वांस पर ध्यान केन्द्रित कर श्वांस की गति को देखे। इस तरह धीरे-धीरे बच्चों में भी ध्यान की रूचि बढ़ेगी। शरीर और आत्मा को जोड़ने वाला श्वांस है। जड़ जीव का भेद ध्यान के द्वारा ही संभव है।

प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में आश्रवों का निरोध यानि रोकना संवर है बताया। कर्म पुद्गलों को रोकना संवर है। यह तभी संभव है जब आत्मा का स्वरूप अनुभव होने लगे। भाव से कर्म बंध तभी रूकेंगे जब जड़ जीव का भेद अनुभव होगा। सब प्रकार के निरोध अर्थात रोकने को संवर कहा जाता है। संवर एक ऐसी स्थिति, अवस्था है जो हमारे परिणाम यानि भाव को बिगड़ने नहीं देते हैं। जीव अपने स्वभाव में है तो भाव संवर है।

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘क्षण भंगुर है जीवन तेरा, क्या ऐसा तूने सोचा है’’ भजन की प्रस्तुति दी।

ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।

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