ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने चार दिवसीय ऑनलाइन आत्म ध्यान शिविर के समापन के अवसर पर फरमाया कि अपने अस्तित्व, अपनी चेतना पर श्रद्धा करनी है। अपने आकार में निराकार तत्व है उस पर श्रद्धा करनी है। सुख आत्मा में भरा हुआ है। शक्ति, ज्ञान, दर्शन आत्मा में भरा है उसको जानो, उसको देखो। यह कैसे देख पाओगे? जब आप देह की पकड़ को छोड़ दोगे। देह की पकड़ बहुत गहरी है, क्योंकि जीव जिस योनि में, जिस गति में, जिस परिवार में जिस संघ में गया उसको अपना मान लिया। अपना मानकर के देह महत्त्वपूर्ण हो गया और जो देह के भीतर जो जीव था वह गौण हो गया। जीव देह में है। पर देह से भिन्न है। देह के गुणधर्म अलग है, आत्मा के गुणधर्म अलग है। दोनों का आपस में संबंध नहीं पर एक दूसरे के साथ टिके हुए हैं।
उन्होंने आगे फरमाया कि संसारी की यात्रा वीतराग पथिक की यात्रा से पूरी तरह भिन्न है, स्वयं को देह मानने वाले संसार की यात्रा कर रहे हैं और स्वयं को जीव मानने वाले अपना संसार सीमित कर रहे हैं, वीतरागता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अपनी अवस्था देखें अनंत की यात्रा में स्वयं को देह माना। परिणाम मिथ्यात्व बढ़ता गया, मोह बढ़ता गया, कर्म बढ़ते गये, भव परिवर्तन चलता रहा। तुम जितना समय अस्तित्व में उतर जाओगे उतना तुम वीतराग यात्रा में आगे बढ़ोगे।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि चार गति 84 लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहा है। इस यात्री को सिद्धशिला की ओर जाना है। अनादिकाल से यह यात्री एक ही गलती करता रहा है जिस देह में जाता है उस देह को अपना मान कर मोह पैदा कर लेता है। देह के प्रति मोह पैदा कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। उन पुद्गलों के चिंतन में आर्त-रौद्र ध्यान के द्वारा अपने कार्मण शरीर को बढ़ाता जाता है। आप सौभाग्यशाली हैं आपको अपने स्वरूप को जानने की विधि मिली और इस अनादिकाल के मिथ्यात्व को तोड़ने की कला आपने सीखी। सम्यक्त्व के संस्कार इन चार दिनों के भीतर आरोहण किये गये।
आज की धर्मसभा में हरियाणा पंजाब चंडीगढ़ के हाईकाॅर्ट न्यायाधीश (जज) श्री आलोक जैन ने दर्शन, प्रवचन श्रवण का लाभ लिया। इसी श्रृंखला में पाली (राजस्थान), इन्दौर, मेरठ, राजपुरा (पंजाब), दिल्ली के गुरु भक्त दर्शन हेतु आए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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