











आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में पर्युषण पर्व के आठवें दिन सभी श्रावक-श्राविकाओं ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर सामूहिक रूप से प्रतिक्रमण, उपवास, पौषध, प्रायश्चित, आलोचना कर कर्मों निर्जित किया। आचार्य भगवन ने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि जिस तरह से मंदिर के शिखर पर कलश चढ़ाया जाता है उसी तरह आज यह पर्युषण पर्व का आठवां दिवस शिखर की तरह विशेष हैं। श्री समवायांग सूत्र में आता है कि वर्षा के पचास दिन बीत जाने के बाद 70 दिन शेष रहने पर भगवान महावीर ने संवत्सरी मनाई। इस विशेष दिन पर सभी प्राणियों से क्षमा याचना की जाती है। जगत के सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है किसी से वैर नहीं। क्षमा हमारा धर्म है, क्षमा हमारी शक्ति है, क्षमा हमारा प्राण है, क्षमा हमारा जीवन है।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि अपने जीवन का होशपूर्वक निरीक्षण करें। आज संवत्सरी के इस विशेष दिन पर आलोचना करें। अवलोकन करें कि ज्यादा समय व्यक्तित्व में बिताया या अस्तित्व में बिताया। उपवास धर्मध्यान केे समय चित्त की क्या दशा रही, यदि कोई कर्म उदय में आये तो उसे किस भाव से लिया आदि का अवलोकन करें। अवलोकन से पता चलता है यदि संसार में मन उलझा हुआ है तो मन को आत्मा में स्थिर करें और आत्मार्थी इस प्रकार आगे बढ़ जाएंगे।
आचार्य भगवन ने संवत्सरी महापर्व पर सभी प्राणियों से क्षमायाचना करते हुए फरमाया कि धर्म का मूल विनय है, धर्म का सार क्षमा है। मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय, अशुभ योग से बंधे कर्मों को क्षय करने के लिए मैं जीवात्मा अपने स्वभाव में रहते हुए। अभेद दृष्टि से प्रत्येक जीव से अन्तःकरण की साक्षी से क्षमा प्रार्थी हूं। चतुर्विध संघ से हुई भूलों के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने संवत्सरी महापर्व का मुख्य केन्द्र बिन्दु आत्मा को बताया।
युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने श्री अंतकृत दशांग सूत्र के आठवें वर्ग का विवेचन करते हुए विविध तपों का रोचक वर्णन सुनाते हुए सबको तप मार्ग में आगे बढ़ने प्रेरणा प्रदान की।
धर्म सभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन करते हुए क्षमा का बहुत बड़ा महत्त्व बताया।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘पर्व संवत्सरी आया है मैत्री संदेशा लाया है’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी। श्री शाश्वतमुनि जी म.सा. ने संवत्सरी महापर्व पर क्षमा भाव अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया।
आत्म भवन में प्रातः 7.00 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान के प्रयोग के द्वारा वर्षभर की आलोचना करवाते हुए अरिहंत प्रभु की वाणी में फरमाया कि स्वयं का अवलोकन करें कि अधिकांश समय कहां बीत रहा है, स्वयं का अवलोकन करें और इस भव में अपना क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्ति का लक्ष्य बनायें।
पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर किया जा रहा है। आज की प्रभावना श्री रविन्द्रनाथ जैन एवं गुप्तदानी परिवार की ओर से थी।
नवदीक्षित शूचित मुनि जी महाराज के 7 ने उपवास करने के उपलक्ष में उन्हें आदर की चादर भेंट की गई।
आज ज्योतिबेन कोठारी ने 11 उपवास, सुश्री गुंजन कोठारी 10 उपवास, श्री अनिल मेहता, रोमिका मेहता, रेखाबेन बोलिया 8 उपवास, श्री हेमन कोठारी 7 उपवास, श्रीमती विनोदबेन 51 एकासन, श्रीमती चंदा मेहता 38 एकासन आदि अनेक तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये एवं तपस्वियों का मोमेन्टो, शॉल, माल द्वारा सम्मान किया गया।
शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अशोक मेहता ने बाहर से आए हुए अतिथियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।
क्षमापना दिवस – आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. प्रातः 7 बजे क्षमापना दिवस पर आत्म भवन में श्रद्धालुओं को मंगल पाठ प्रदान करेंगे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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