संवत्सरी महापर्व आत्मशुद्धि का दिन |

8 SEPTEMBER 2024

अवध संगरीला में आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में संवत्सरी महापर्व आयोजित हुआ। संवत्सरी पर्व पर उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य सम्राट डा. शिवमुनि जी म.सा. ने फरमाया कि सवंत्सरी महापर्व प्राणी मात्र के प्रति दया, करुणा का भाव रखते हुए जीवमात्र से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगने का दिन है। क्षमा देने से व्यक्ति समस्त जीवों को अभयदान देते हैं, पर्युषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाना है।

उन्होंने फरमाया कि संवत्सरी महापर्व कार्मण शरीर को हल्का करने, कषायों को क्षीण करने, विभाव से स्वभाव में आने का, असत्य से सत्य में आने का, अज्ञान से ज्ञान में प्रवेश करने का, त्याग, वैराग्य वीतरागता में प्रवेश करने का दिन है।

उन्होंने फरमाया कि संवत्सरी महापर्व आत्म शुद्धि का दिन है। आलोचना जीवन में बहुत आवश्यक है। व्यक्ति जहां-जहां विभाव में जाकर कत्र्ता-भोक्ता में आया हो, जहां काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आया हो तो उसका आत्म निरीक्षण कर उसकी आलोचना करनी चाहिए। यदि किसी से कोई भूलवश कोई पाप हो जाए तो गुरु के सामने जाकर उसकी आलोचना करनी चाहिए।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वांचन करते हुए फरमाया कि हमने अनंत जन्मों में जो बंधन बांधें हैं उन सबका आलोचना प्रतिक्रमण प्रायश्चित करते हैं और अंतकृतशांग सूत्र वाचन में आता है कि किस प्रकार उन भव्य आत्माओं ने इसी भव में सिद्धशिला पहुंच गए और कैसे त्याग, वीतरागता, वैराग्य में आगे बढ़े। जिस देह के प्रति हम आसक्त हैं उन्होंने कैसे मोह तोड़ा, मिथ्यात्व तोड़ा तो संयम में आए और संयम में आने के बाद देह को मोह तोड़कर के घाति कर्मों को क्षय करके केवल ज्ञान केवल दर्शन प्राप्त कर लिया और निर्वाण को भी प्राप्त हो गए।

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा. ने अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।

इससे पूर्व वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान के प्रयोग के माध्यम से आलोचना एवं आचार्य भगवन द्वारा मंगल मैत्री करवाई।

इस अवसर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान लिए।

शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से तपस्वियों का शाॅल, स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष श्री अशोक मेहता ने किया।

- आचार्य शिवमुनि

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