संलेखना है अंतिम समय की अमृत साधना |

3 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने संलेखना को अंतिम समय की अमृत साधना बताते हुए फरमाया कि जब अंतिम समय में व्यक्ति का शरीर काम नहीं करता हो उस समय स्वेच्छा से यथा शक्ति संथारा संलेखना करता है तो वह अमृत साधना है। जिसने अंतिम मृत्यु को समझ लिया उसकी जिंदगी सफल हो जाती है।

उन्होंने फरमाया कि जो साधक दुःखी व चिंतित रहता है वह साधक अपनी साधना में परिपूर्ण नहीं हो सकता। धर्म है अपने स्वभाव में रहना। किसी से मान, माया लोभ, राग-द्वेष किया हो अंतिम समय में पश्चाताप करना चाहिए। व्यक्ति को अपने कर्मों को भुगतना पड़ता है। भगवान महावीर, बुद्ध, राम, कृष्ण को भी अपने कर्मों को भुगतना पड़ा इसलिए जाने-अनजाने में गलती हो गई हो तो क्षमा मांग लेना चाहिए। जो क्षमा देता है, क्षमा लेता है, वह बड़ा है।
उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति के जीवन में संकल्प होना चाहिए कि मुझे धर्म की आराधना करनी है। जब तक बुढापा नहीं आता तब तक धर्म आराधना करते रहना चाहिए। धर्म इतना सहज, सरल है कि इसे आसानी से किया जा सकता है।

श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आत्मा का मूल गुण ज्ञान और दर्शन है। ज्ञान से जानो और दर्शन से देखों जो दोनों साथ-साथ चलते हैं। ज्ञान, ज्ञान के साधन और ज्ञानी के प्रति मन में द्वेष के भाव पैदा करता है तो वह प्रदोष कहलाता है जिससे कर्मों का बंधन होता है। शिक्षक या किसी से ज्ञान लिया है तो उसके उपकार को नहीं भूलना चाहिए उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।

प्रवचन प्रभाकर शमित मुनि जी म.सा. ‘‘जरा सा इतना बता दो भगवन लगन कैसी यह लगा रहे हो’’ भजन की प्रस्तुति दी।

आज की सभा में गुड़गांव, भटिण्डा, अबोहर आदि जगहों से श्रद्धालुगण गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

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