श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने साधु धर्म और गृहस्थ धर्म की चर्चा में फरमाया कि भगवान ने दो धर्म बताये एक साधु का धर्म दूसरा गृहस्थ धर्म। श्रावक अणुव्रत ग्रहण कर मर्यादा पूर्वक जीवन जीता है तो मोक्ष के निकट पहुंच सकता है। उन्होंने सामायिक व्रत की चर्चा करते हुए फरमाया कि आत्मा ही सामायिक है। विश्व की सारी शक्तियां आत्मा में है। आत्मा सर्वशक्तिमान है, आत्मा में ज्ञान है, आत्मा में अनंत सुख है आत्मा ही सत्य है। पुणिया श्रावक जो शुद्ध सामायिक करता था उसकी सामायिक को चक्रव्रती सम्राट हीरे जवाहरात देकर भी नहीं खरीद पाया, सामायिक से नरक गति को भी टाला जा सकता है। धर्म को खरीदा व बेचा नहीं जा सकता, धर्म को ग्रहण किया जाता है। आत्मा में पहुंचने के लिए मन, बुद्धि, इंन्द्रियां, संस्कार, धारणा इनसे पार जाना होगा। उन्होंने फरमाया कि लाभ-हानि, संयोग-वियोग, निंदा-प्रशंसा, ह्रास-विकास, अनुकूल-प्रतिकूल ये जो जीवन के विभिन्न पक्ष हैं, जिनसे आप बच भी नहीं सकते, कोई नहीं बच सकता क्योंकि यह जीवन कर्म के अनुसार चल रहा है, प्रकृति के अनुसार चल रहा है, कर्म सबके भिन्न-भिन्न हैं, प्रकृतियां सबकी भिन्न-भिन्न हैं, इसीलिए समय पर भिन्न-भिन्न वातावरण, भिन्न-भिन्न परिस्थितियां बन जाती हैं। कभी दुःख, कभी सुख आ जाता है। सामायिक यह सिखाती है कि जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में यह जीव एकरूप बनकर रहे। समता में रहे, शांति में रहे, बौखलाए नहीं, उत्तेजित न हो। आवेश में न आए। अपने स्वरूप में अवस्थित रहे और यह सोचे कि यह जो कुछ घटित हो रहा है, यह कर्मों के अनुसार हो रहा है। इन पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। मैं क्या कर सकता हूं? यह तो हो ही रहा है। मेरा एक ही धर्म है कि मैं इन परिस्थितियों में समता और शांति से रहूं। आपका यह समभाव आप दो घड़ी में अर्जित करते हैं। यदि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की दृष्टि से शुद्ध सामायिक हो जाए तो आपको समता की कुछ आय हो सकती है। इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने छठे अध्ययन में आश्रव में कर्म बंधनों की चर्चा करते हुए फरमाया कि कर्म के आने के रास्ते को नहीं जानेंगे तो मुक्ति संभव नहीं है। विभाव व अज्ञान अवस्था में कर्म बंधन के कारण व्यक्ति चार गति 84 लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहा है। प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘एक बार तू मुख से बोल जरा अरिहंत प्रभु-अरिहंत प्रभु’’ भजन की प्रस्तुति दी। आज पूना, दुर्ग (छत्तीसगढ़), पूना, इन्दौर, देवगढ़, चैन्नई आदि अनेक जगहों से आचार्य श्री जी दर्शन हेतु श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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