‘जीव अपने किए हुए कर्मों से सुख और दुःख का अनुभव करता है। आत्मा ही मित्र है, आत्मा ही शत्रु है। आत्मा अपने स्वभाव में रहती है तो वह मित्र और जब वह विभाव में चली जाती है तो शत्रु बन जाती है। यदि जीव पुदगल का आश्रय छोड़ दे तो जीव इस संसार सागर से पार हो सकता है।’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. श्री शिव मुनि जी म.सा. ने गुरुवार को अपने उद्बोधन में फरमाये।
उन्होंने आगे फरमाया कि संसार अनंत जीवों से भरा पड़ा है। सभी जीवों के गुण धर्म समान है, किसी भी जीव के गुण धर्म भिन्न-भिन्न नहीं हैं। उसके अपने ही गुण धर्म है उसी में समाया हुआ है। मन, बुद्धि, इन्द्रियां, शरीर ये पुद्गल हैं, जब जीव पुद्गल मेेें चला जाता है तो वह अपनी शक्ति क्षीण कर देता है और वह संसार सागर में भ्रमण करने लगता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जीव को यदि अपने स्वरूप का बोध हो जाये। जीव स्वयं को जानने और स्वयं में रूचि रखने और स्वयं में ही ठहरने की कला सीख ले तो वह कर्मों को तोड़ सकता है और वह भीतर अनंत सुख बढ़ा सकता है। यदि जीव को कोई विचार आ गया, पुद्गल का चिंतन आ गया तो उस समय कर्मों को तोड़ने की धारा रूक जाती है और कर्म बंधन की धारा शुरू हो जाती है।
उन्होंने साधना को मोक्ष का मार्ग बताते हुए फरमाया कि चैबीस घंटे में व्यक्ति निर्विचार और निर्विकल्प अवस्था में कितना समय रहता है वह प्रमुख है। क्रियाएं, घटनाएं बदलती रहती है, परंतु सबकुछ घटनाएं बदलते हुए जीव अपने में ठहर जाए यही साधना और मोक्ष का मार्ग है।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का विवेचन करते हुए फरमाया कि तत्व में जीने से जीव मुक्ति का अधिकारी बनता है। सिद्धशिला में सभी जीव एक समान है। उन्होंने एकेन्द्रिय जीव की वेदना के विवेचन में फरमाया कि जैसे कोई एक व्यक्ति आंखों से अंधा है, कानों से बहरा है, मुख से गूंगा है, असमर्थ है और यदि उसके ऊपर एक सोलह वर्ष की आयु का लड़का उसके ऊपर उछल कूद करता है तो उसको जितनी वेदना होती होगी उससे भी अधिक वेदना एकेन्द्रिय जीव को होती है।
श्रमण संघीय सहमंत्री युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘मेरी आस यही अरदास यही हर श्वास तेरे गुण गाया करूं’’ भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर ‘आत्मार्थी’ श्री शौर्य मुनि जी म.सा. ने 6 उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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