श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि लोक के साथ-साथ परलोक का ध्यान रहे और वह यह माने और समझे कि जीवन इतना ही नहीं है। बहुत जीवन छोड़े जा चुके हैं और आगामी समय में यदि कर्म शेष हैं तो अन्य भी जीवन प्राप्त होते हैं। उन जीवनों में कुछ जीवन अच्छे हैं, कुछ जीवन बुरे हैं, जिन्हें हम शुभ गति और अशुभ गति कहते हैं। नरक, तिर्यंच अशुभ गतियां हैं। मनुष्य और देव शुभ गतियां हैं। इसका निर्णय कोई परमात्मा नहीं करता, इसका निर्णय जीव का कर्म करता है।
उन्होंने फरमाया कि संलेखना के क्षणों में व्यक्ति को यह चिंतन करना चाहिए कि आज तक जो कुछ किया है, उसे क्षय करना है, उस बंधन को तोड़ना है। बंधन मैंने बनाए हैं, मैं ही तोडूंगा। जो चीज़ स्वयं बनाई जाती है, वह स्वयं तोड़ी जाती है। यह बंध स्वकृत है, स्वयं ही इसे तोड़ना होगा। ये बंधन पराक्रम से तोड़े जाएंगे।
उन्होंने आगे फरमाया कि जैन धर्म ने कहा-आत्मा पर कर्मों का आवरण पड़ा हुआ है। मतिज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मनः पर्यवज्ञानावरणीय केवलज्ञानावरणीय कर्म-ये पांच रूप में पर्दा आपकी आत्मा पर पड़ा हुआ है। जब ये तहें उठती हैं तो आत्मा का जो अपना ज्ञानमय स्वभाव है, वह प्रकट हो जाता है।
उन्होंने उपासक दशांग सूत्र में आनन्द श्रावक के विषय में फरमाया कि आनंद में चारित्र, तप के प्रभाव से अनायास अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ, किन्तु उसे अवधिज्ञान का अभिमान नहीं है। उसके लिए प्रयत्न नहीं था, वह लक्ष्य भी नहीं था। आंनद की संलेखना या संथारा उस अवधिज्ञान के लिए नहीं थी, आत्म-कल्याण के लिए थी किन्तु बीच में एक उपलब्धि उसे हो गई। अवधिज्ञान होने के अनन्तर वह और अधिक आत्मनिष्ठ हो गया। उसकी श्रद्धा और दृढ़ हो गई। उसका विश्वास और दृढ़ हो गया।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब तक बंध को रोकेंगे नहीं तब तक जीव मुक्त नहीं हो सकता। आत्मा एकदम शुद्ध होती है जब कर्मों का संबंध उससे होता है तब उसका रूप ढक जाता है, जैसे आकाश में सूर्य की रोशनी के आगे बादल आ जाने से सूर्य की रोशनी को ढक देते हैं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘दर पे तुम्हारे, मैं आया हूं भगवन, दया की नजर से मेरी झोली भर दो’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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