

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. के सान्निध्य में एवं शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के तत्वावधान में पंच दिवसीय शिक्षक प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन शिविरार्थियों एवं धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि संसारी और सिद्ध में क्या अंतर है? जो सिद्ध हो गये वे कैसे सिद्ध बने? पूरे ब्रह्माण्ड में अपने अस्तित्व को देखो। संसारी व्यक्ति ने अनंत देह धारण किये वह स्त्री बना, पुरुष बना, देव बना, तिर्यंच में गया, नरक में गया, इन सब गतियों में भ्रमण करता रहा और उसने देह को अपना मान लिया, जो जन्मों-जन्मों का मिथ्यात्व है। व्यक्ति मोह के कारण इस संसार में हैं। जो अनंत सिद्ध हो गये जिन्होंने मोह मिथ्यात्व को समाप्त कर दिया वे अपने में स्थित हो गये। मोह कर्म से मुक्त होकर अपनी यात्रा पूर्ण कर गये। एक साधक की इच्छा होती है कि मैं भी सिद्ध बन जाऊं, परंतु इच्छा से सिद्ध नहीं बन सकते। सिद्ध बनने के लिए संकल्प, साधना और पुरुषार्थ आवश्यक है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र वांचन में सातवें अध्याय की चर्चा करते हुए फरमाया कि व्रत की चर्चा में आश्रव लग जाते हैं कैसे बचना है। व्रती साधक मृत्यु से घबराता नहीं है मृत्यु को महोत्सव मनाता है। जैसे घर परिवार में जन्म को मनाते हैं वैसे ही मृत्यु को महोत्सव मनाता है। मैं इसके मोह को पूरा तोड़कर आराधना में लीन हो जाऊं। संलेखना में शरीर व कषायों को कृश करना है। कषायों से जो प्रीति है उसे समाप्त किया जाता है। शब्द, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श इनको कृष किया जाता है।
पहले विषयों को कषाय को कृश करोगे तो आहार का ममत्व घटता जाएगा। मरण आ गया है तो उसे टाला नहीं जाता। ज्ञानी विवेक पूर्वक शरीर को छोड़ता है। कषायों को त्यागकर चारों आहार का त्याग करता है। संलेखनाधारी को मृत्यु स्पष्ट दिखाई देती है। अपना धर्म क्या है कि अब हर प्रकार से शरीर टिकने की
संभावना नहीं है, छोड़ना है तो मोह भाव में नहीं, जीव के स्वभाव की रक्षा के लिए वह शरीर को अंतःकरण से छोड़ता है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘एक बार तू मुख से बोल जरा अरिहंत प्र्रभु-अरिहंत प्रभु’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में भीलवाड़ा, उदयपुर से गुरुदर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए। जैन कॉन्फ्रेंस महिला शाखा नई दिल्ली की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा श्रीमती लाडजी मेहता ने भीलवाड़ा संघ की ओर से अपनी भावनाएं व्यक्त की।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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