
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने श्री आचारांग सूत्र की चर्चा करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान की वाणी कहती है कि एक मुनि ने जिस भाव से घर-परिवार छोड़ा है वही भाव दीर्घकाल तक रहना चाहिए। किसी प्रकार का संशय न करके संयम का पालन करना चाहिए। यदि संयम मार्ग पर चलते हुए चित्त स्थिर नहीं रहे तो भीतर श्रद्धा करनी चाहिए कि मैं आत्मा हूं, मेरे पास मेरे अलाव कुछ नहीं है।
उन्होंने आगे फरमाया आत्मज्ञानी सद्गुरु ही शिष्य के चित्त को स्थिर कर सकते हैं। जो स्वयं उस पथ पर चलते हैं। अपने में ठहरना स्थविर कहते हैं। देश में अनेक यौद्धा हुए जिसे वीर कहते हैं उसी तरह जिनवाणी में काम, क्रोध, लोभ, मान, माया, लोभ इन विकारों पर जिसने विजय प्राप्त कर ली वह वीर है।
उन्होंने प्रतिदिन की दिनचर्या के अवलोकन की चर्चा करते हुए फरमाया कि व्यक्ति स्वयं अपना आत्म निरीक्षण करे कि उठते-बैठते, चलते हुए किसी सूक्ष्म जीवों की हिंसा हुई हो, कहीं कटु वचन बोला हो या कहीं कोई दोश लगा तो अंतःकरण से क्षमा मांगनी चाहिए, इससे कर्मों की निर्जरा होती है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि भगवान की वाणी कहती है कि यदि गुस्सा आ जाए तो मौन हो जाओ, ‘सोह्म’ की साधना करो, जिससे गुस्सा शांत हो जाता है और इससे साधना बढ़ेगी जो जिन षासन का राजमार्ग है।
उन्होंने फरमाया कि कर्म पुद्गल है और जीव शुद्ध आत्मा है। यदि किसी का उपकार करते हैं तो पुण्य होता है और किसी को दुःख देते है तो पाप। भगवान की वाणी में पुण्य पाप दोनों बेड़ियां है जो पाप और पुण्य दोनों का बंधन करती है। जो कर्म बांधे हैं उसे काटना है। इसलिए कर्मों के आने के रास्ते को रोको, कर्मों की निर्जरा करो, ध्यान ही निर्जरा का मार्ग है।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में मानव जीवन को वृक्ष के पत्तों के समान बताते हुए फरमाया कि जिस तरह वृक्ष के हरे पत्ते कुछ समय बाद पीले पड़ जाते हैं और जब बसंत ऋतु आती है तो गिर जाते हैं। वैसे ही यह मानव जीवन बचपन जवानी बुढ़ापा और अंत समय में इस दुनिया से चला जाता है। इसलिए मनुष्य भव परिवर्तन होने से पूर्व में अपने साथ में एक आत्म धन कमाकर साथे ले जाए, प्रत्येक श्वांस का उपयोग भेद ज्ञान में करें। समय मात्र भी प्रमाद नहीं करे। यह वर्षावास का समय ध्यान साधना के लिए है।
मधुर संगायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘आत्म भावों को हरदम निहारा करो, एक अर्हम ही अर्हम पुकारा करो’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।
सचिन से निकुंज भाई ने नौ दिन के उपवास का पच्चखान लिया, साथ ही प्रत्यक्ष एवं ऑनलाईन के माध्यम से अपनी धारणानुसार तपस्वियों ने पच्चक्खान लिये। तपस्वियों का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन द्वारा शॉल माला द्वारा सम्मान किया गया
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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