श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि जीव शुद्ध था, शुद्ध है और शुद्ध ही रहेगा चाहे वह किसी गति में चला जाएगा। परंतु जीव के साथ कर्म लगकर चार गति 84 लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहा है। कर्म क्यों लगता है? वह जिस योनि में गया, उसने उसे अपना मान लिया। जीव अपने को छोड़कर पुदगल यानि जो भी आकार मन, इन्द्रियां, बुद्धि, पुरुष, स्त्री, धन-दौलत के प्रति आकर्षित होता है तो कर्म का आवरण आना शुरू हो जाता है। जड़ और जीव का भेद कर दे, जीव अपने में स्थित रहने का निरंतर प्रयास करता रहे। यह साधना भगवान महावीर की है, तीर्थंकरों की है। इस संसार से पार होने के लिए इस साधना को जीवन में अंगीकार करें।
उन्होंने आगे फरमाया कि सदाचार का अर्थ है- सत्य का आचरण करना। जीवन के जितने सद्गुण हैं, इन सभी का समावेश सदाचार में हो जाता है। व्यक्ति के जीवन में यदि और कोई विशेष गुण न हो, उपलब्धि न हो तो कम से कम उसके जीवन में सदाचार तो रहना चाहिए। यह सदाचार सारे व्रतों को टिका कर रखता हैं।
जैन ग्रन्थों में विवाह के कोई विधि विधान नहीं बताए गए, कोई मन्त्र विवाह के नहीं बताए गए, जैन दर्शन ने केवल मोक्ष, कल्याण, व्रतों की बात की है कि आप अपने मार्ग में ईमानदार होकर चलें। हमारे तीर्थंकरों, महर्षियों ने हमारे जीवन की एक मर्यादा बनाई है कि जिसे आपने अपना बना लिया, उसके प्रति समर्पित होकर रहें। यदि यह समर्पण आ जाए तो सदाचार आएगा।
आज वैज्ञानिक युग में कितने ही साधन उपलब्ध हैं, परन्तु ब्रह्मचर्य, संयम, आत्मनिष्ठा, इन्द्रिय-निग्रह के द्वारा यदि वह सदाचार का पालन करता है तो उसका परिवार भी सीमित रहता है, शरीर भी निरोग रहता है, मन भी स्वस्थ रहता है, दिमाग में परेशानियां भी नहीं होती और वह आध्यात्मिक दृष्टि से धार्मिक भी रहता है और जीवन में भी शांति बनी रहती है।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘मान को तज दे तू मानव मान जिन वचन’’ भजन के साथ अहंकार और आठ प्रकार के मद नहीं करने चाहिए इस बारे में बताया।
श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘आजा रे आजा रे आजा द्वार प्रभु के समय गुजरता जाता’’ भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर बैंगलोर, राजाजी का करेड़ा, भीलवाड़ा, राणियां, सवाईमाधोपुर आदि जगहों से आए गुरुभक्तों ने प्रवचन का लाभ लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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