सत्गुरु के उपदेश से बदल जाता है जीवन |

- आचार्य शिवमुनि

4 August 2026

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि तीन प्रकार की आत्मा होती है – बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा। अन्तरात्मा के लिए बहिरात्मा का त्याग कर परमात्मा बनने की ओर अग्रसर होना चाहिए। बहिरात्मा वह है जो बाहर के पुद्गल को ही सुख मानती है। व्यक्ति तीन कारणों से अपने स्वरूप के बोध को जान सकता है, जिसमें पहला है भगवान की वाणी के द्वारा, दूसरा सत्गुरु के उपदेश के द्वारा और तीसरा अपने अन्तःकरण के द्वारा।

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि तीर्थंकर भगवान के उपदेश से चण्डकौशिक सर्प ने समता धारण कर ली तो देवलोक में चला गया। इसी तरह मेघकुमार राजकुमार था उन्होंने दीक्षा ले ली और पहली ही रात्रि में उन्हें उपाश्रय में संतों के द्वारा ठोकर लगी तो उनके भीतर विचार आया कि आज तक ये सब साधु मुझे राजकुमार कहते थे और आज दीक्षित होते ही पहली रात्रि में मुझे ठोकर मार रहे हैं इससे तो अच्छा मेरा महल वाला जीवन था, ऐसा विचार कर उन्होंने प्रातः काल भगवान को उपकरण सौंपकर गृहस्थ अवस्था में जाने का सोचा जब भगवान के पास पहुंचे तो भगवान ने उन्हें उनके पूर्व भव की याद दिलाई। भगवान ने कहा पहले जन्म में तू हाथी था, जंगल में आग लग गई। एक छोटे से खरगोश की जान बचाने के लिए तुमने तीन दिन तक अपने एक पांव को उपर आकाश में रखा, तुम्हारी इस करुणा के कारण तुम राजकुमार बने हो। और अब साधु बनकर वापिस महल जा रहे हो, भगवान ने बोध देकर मेघकुमार को जगाया, इसी तरह उपदेश से व्यक्ति का जीवन बदल जाता है।

प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने सभी श्रावक-श्राविकाओं को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि पुराने बंधे द्रव्य कर्म जब उदय आते हैं तो जीव भाव कर्म करता है। भाव में राग भाव करता है तो नये व पुराने कर्मों का बंध होता है, अगर जीव उस समय होश में आ जाए, जीव को साधना की विधि मिल जाए तो कर्म चक्र को तोड़ सकता है। व्यक्ति विचार करे कि मैं स्वभाव में रहूं या विभाव में रहूं अपने भाव पुनः खराब नहीं करूंगा। मैं जीव ज्ञाता-दृष्टा भाव में रहूंगा यह होश रहे तो वह पुराने कर्मों को भी क्षय कर सकता है और नये कर्मों के बंधन को रोक सकता है।

श्री शाश्वत मुनि जी म. सा. ने ‘‘अरिहंत बनना है, मुझे सिद्ध बनना है’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।

आज बारामती, जावरा, सिकन्दराबाद आदि जगहों से श्रद्धालु आचार्य भगवन के दर्शनार्थ उपस्थित हुए। जावरा से आये श्री अभय सुराणा ने अपनी भावनाएं व्यक्त की।

सूरत त्रिकम नगर से 9 की तपस्या करने वाले श्री कांतिलाल भोगर ने आज 8 की तपस्या का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का स्वागत सम्मान किया गया।

आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन कृतार्थ करें।

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