सच्चा श्रमण वही है जो कर्म युद्ध में विजय प्राप्त करता है|

- आचार्य शिवमुनि

13 OCTOBER 2025

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उपस्थित श्रद्धालुओं को ध्यान का प्रयोग करवाते हुए मंगल पाठ श्रवण कराया।

युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने बाईसवें अध्ययन रथनेमीय की 51 गाथा का मूल वांचन किया।

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने पाप श्रमण और श्रेष्ठ श्रमण का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि साधु के पास ज्ञान होने पर भी वह अभिमान नहीं करता। जिसके जीवन में कषाय है वह पूर्ण रूप साधु नहीं हो सकता। कई ऐसे साधु भी हो सकते हैं जो केवल अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए अपने जीवन का ध्येय बनाकर छह काय जीवों की विराधना करते हैं वे गुरु के साथ छल करते हैं, वह श्रेष्ठ श्रमण नहीं हो सकते। वह एक प्रकार से अन्य साधुओं के लिए भी हितकर नहीं हो सकते जैसे एक मछली पूरे तालाब के पानी को खराब कर देती है वैसे ही वह पाप श्रमण अन्य संतों पर भी लांछन लगाने का काम करता है। साधु में धन की, धाम की, नाम प्रसिद्धि की कामना नहीं होनी चाहिए। साधु के भीतर मोह, मूर्च्छा, ममत्व की भावना नहीं होनी चाहिए। श्रेष्ठ आचरण व गुरु आज्ञा का पालन करने वाला साधु ही अपने जीवन का कल्याण करता है।

उन्होंने संजय राजर्षि के कथानक का विवेचन करते हुए फरमाया कि संजय राजर्षि कांपिल्य नगरी में रहता है वह एक दिन शिकार के लिए हाथी, घोड़े, पैदल चलने वाले चतुरंगीय सैनिकों के साथ केसर उद्यान की तरफ जाता है जहां हिरणों का झुण्ड होता है और वह अनेक हिरणों का शिकार करते हुए आगे बढ़ता जाता है और घायल हिरण भी आगे भागते जाते हैं, जहां एक गर्दभाली मुनि अपनी ध्यान साधना में लीन थे, राजा उन्हें देखकर भयभीत होता है कि यह हिरण कहीं इस मुनि के तो नहीं इन हिरणों को मैंने कष्ट पहुंचाया है। कहीं यह मुनि मुझे श्राप न दे दे, कहीं मुझे भस्मीभूत नहीं कर दे। राजा भयभीत होता हुआ मुनि से क्षमायाचना करता है उस समय मुनि राजा को कहते हैं जैसे तुम मुझसे भयभीतर हो रहे हो वैसे ही यह वन्य जीव तुमसे भयभीत हो रहे हैं। मैं तुम्हें अभय देता हूं तुम इनको अभय दो। मुनि राजा को कहते हैं कि हिरणों की हत्या के पाप कर्मों को तो भुगतना ही पड़ेगा। मुनि की बातें सुनकर संजय राजर्षि को वैराग्य हो जाता है। संजय राजर्षि तलवार, मुकुट उतार कर हिंसा का त्यागकर उसी समय मुनि दीक्षा ले लेते हैं। दीक्षा के बाद संजय मुनि का क्षत्रिय राजर्षि से संपर्क होता है उस समय क्षत्रिय राजर्षि संजय मुनि से प्रश्न पूछते हैं कि तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारा गौत्र क्या है? तुम किस कारण से मुनि बने हो? तुम किस प्रकार गुरु की सेवा करते हो? तुम किस कारण से विनीत कहे जाते हो? इन प्रश्नों के उत्तर में संजय मुनि बताते हैं कि इस शरीर का नाम संजय, गौत्र गौतम है, मेरे धर्माचार्य गर्दभाली हैं और मैं मुक्ति के लिए मैं मुनि बना हूं और गुरु की आज्ञा अनुसार मैं उनकी सेवा करता हूं।

इसी प्रकार व्यक्ति का लक्ष्य मोक्ष का होना चाहिए, गुरु के पास रहकर गुरु की सेवा करनी चाहिए। विनीत शिष्य गुरु के अलावा कुछ सोचता नहीं है। सच्चा श्रमण बनना है तो इस कर्म महायुद्ध को जीतकर विजय के साथ आगे बढ़ना है।

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