

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि ऐसी इच्छाएं नहीं रखनी चाहिए, जिनसे विचार दूषित हों, वाणी दूषित हो, व्यवहार और आचार विकृत हो। आचार को शुद्ध, पवित्र बनाए रखने और इस जीवन में भी शांति पूर्वक जीने के लिए निरर्थक इच्छाओं का त्याग अपेक्षित है। सुख लौकिक और भौतिक भी होता है किन्तु शांति भौतिक नहीं होती। शांति आत्मिक और आध्यात्मिक होती है। भगवान महावीर आत्मिक शांति के लिए सांसारिक सुखों को त्याग देते हैं। उन्होंने घरबार आत्म-शांति के लिए छोड़ा।
उन्होंने आगे फरमाया कि भगवान महावीर ने इच्छा परिमाण दो दृष्टियों से समझाया है एक आत्म विकास के लिए, एक समाज की व्यवस्था ठीक रखने के लिए। अतः व्यक्ति निरर्थक इच्छाओं को छोड़े तथा सार्थक इच्छाओं का संक्षेपीकरण करे। आज तक प्रमादी, अज्ञानी, आलसी, अधर्मी व्यक्ति को धन के द्वारा त्राण, शांति कभी नहीं मिली, न आगे प्राप्त हो सकती है, अपितु उसकी दशा ऐसी हो जाती है जैसे कि कोई व्यक्ति गुफा में दीपक लेकर बढ़ रहा है। आगे जाकर वह दीपक बुझ जाए तो वह काफी मार्ग पार कर चुका होता है। उस व्यक्ति की क्या दशा होती है? न तो वह अंधेरे में वापिस आ सकता है, न वह आगे गुफा के अंदर जा सकता है। इस तृष्णा की गुफा में प्रविष्ट व्यक्ति की यही स्थिति रहती है। वह इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए जीवन के पथ पर बहुत आगे निकल जाता है, किन्तु आगे जाकर उसके विवेक का दीपक बुझ जाता है। न आगे कुछ प्राप्त होता है, परलोक भी बिगड़ जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि कैलाश पर्वत जितने सोने और चांदी के पर्वत किसी व्यक्ति को दे दिए जाएं तो भी लोभी का लोभ पूर्ण नहीं हो सकता क्योंकि इच्छा आकाश के समान अनन्त है। जैसे आकाश का कोई किनारा नहीं है, इसी प्रकार व्यक्ति की तृष्णा, वासना, इच्छा का कोई अंत नहीं है।
उन्होंने आगे इच्छा परिमाण की चर्चा करते हुए फरमाया कि आत्म विकास और समाज व्यवस्था के लिए व्यक्ति को निरर्थक इच्छाओं को छोड़ना चाहिए। जहां इच्छा है वहां संसार खड़ा है। मनुष्य की अनंत इच्छाएं हैं, भोगी व्यक्ति को सोने और चांदी के पहाड़ मिल जाए परंतु इच्छा आकाश के समान अनंत है।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ‘‘अपनी कर पहचान जगत में, अपना रूप निराला’’ भजन प्रस्तुत करते हुए अपने उद्बोधन में आनन्द पूर्वक जीने के तीन सूत्र बताये। जो घटनाएं जीवन में घट रही है उसे अहोभाव से स्वीकार करना। जो मिल रहा है वह आपका ही बोया है निमित्त निर्दोष होता है। अपने आपको समता में प्रतिष्ठित करने से आनन्दमय जीवन हो सकता है।
इससे पूर्व श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने भी अपना उद्बोधन दिया।
इस अवसर पर मेवाड़ संघ मुंबई, जालंधर, बैंगलोर, दिल्ली, जम्मू, सूरत भक्तों ने सत्संग का लाभ लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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