




आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में ऑनलाईन आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। यह आत्म ध्यान धर्मयज्ञ बेसिक, चार दिवसीय एवं दस दिवसीय है। जिसका झूम के माध्यम से नासिक ध्यान केन्द्र एवं आदीश्वर धाम कुप्पकलां के साधकों हेतु लाईव प्रसारण किया जा रहा है।
आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के प्रथम दिन आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आत्मार्थी साधकों को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया और ‘सोहम’ का महत्त्व बताया। उन्होंने फरमाया कि ‘सोहम्’ आत्मा और परमात्मा के मिलन की एक प्रकार की ध्वनि है जिसमें श्वांस लेते समय ‘सो’ और श्वांस छोड़ते समय ‘हम’ का अभ्यास किया जाता है। इससे मन जल्दी एकाग्र और शांत हो जाता हैं।
आचार्य भगवन ने समाधि तंत्र के अंतर्गत दुःखों के कारणों पर चर्चा करते हुए फरमाया कि जीव तत्व को जाना नहीं और शरीर को आत्मा मान लिया जो संसार के दुःखों का कारण है। शरीर जिसमें आंखे बाहर के दृश्य देखती है, जिह्वा बाहर का स्वाद चखती है इस प्रकार पांचों इन्द्रियों के 23 विषय और 140 विकार मन को घुमाते हैं। व्यक्ति आत्मा के अनंत सुख को भूलकर बाह्य सुख में उलझा हुआ है। जब मन नहीं लगता है तो विदेश घूमने चला जाता है यह सुख नहीं एक मन का परिवर्तन है, मन व्यक्ति को घुमाता है। विषयों की आसक्ति और मोह ये संसार में फंसाने वाले हैं। इन्द्रियों में न फंसने के लिए तीन गुप्ति जिसमें मन गुप्ति, वचन गुप्ति और काया गुप्ति के द्वारा स्वयं को वश में किया जा सकता है।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के आत्मार्थी साधकों को वाचिक, मानसिक मौन रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने फरमाया कि न भूतकाल न भविष्यकाल के किसी भी प्रकार के विचार को महत्त्व न दें, यदि विचार आए तो आते-जाते श्वांस का आलम्बन ले सकते हैं। भोजन में उणोदरी तप जरूर करना चाहिए यानि भूख से थोड़ा कम खाना उणोदरी तप है। उणोदरी तप साधना में सहायक है।
आत्मा का ध्यान नहीं करंेगे तो चौबीस घंटे कर्मों का बंधन चलता रहेगा। आत्म ध्यान धर्म यज्ञ में क्रिया से कोई संबंध नहीं है, क्रिया से आगे भावों तक कैसे जाना है। स्वभाव और विभाव में पहले शरीर में जाना है या बाहर जो दिखाई दे रहा है उसमें मैं रह रहा हूं। अंदर बैठा निराकार अरूपी तत्व है, जो अष्टगुणों से युक्त है उस आत्मा का अनुभव करना है। जानना देखना आत्मा का गुण है बुद्धि, इन्द्रियों का गुण नहीं है। भीतर आत्मा का ज्ञान संचालित होता है। इन्द्रियों से हटकर यदि आत्मा अपने स्वरूप में चली जाती है तो मन की शक्ति कमजोर हो जाती है। इस स्थिति में आत्मा का ज्ञान संचालित होता है। आत्मा के पास आठ गुणों की सम्पदा है।
वीतराग साधिका निशाजी ने आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के अंतर्गत दो सत्रों में अरिहंत प्रभु की कृपा से ध्यान का प्रयोग करवाया।
ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ का कार्यक्रम गतिमान है। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन को कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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