


श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन, नाशिक (महाराष्ट्र), कुप्पकलां (पंजाब) में आयोजित हो रहा है, जिसका सीधा प्रसारण सूरत से किया जा रहा है। लाईव प्रसारण पर प्रसारित आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के पंचम दिवस पर आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान के प्रयोग में साधकों को जड़ जीव का भेद करवाते हुए सिर के सिरे से पांव के अंगूठे तक आत्म प्रदेशों के स्पंदन का अनुभव करवाया।
आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि मैं अष्टगुणों से युक्त आत्मा जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति है। यह एक सत्य है कि मैं आत्मा निराकार हूं, मेरा जन्म-मरण नहीं। अनादि काल से संसार में भ्रमण कर रहा हूं। अब मुझे जन्म-मरण का अंत करना है। अब तक अज्ञानवश मैंने मन, बुद्धि, इन्द्रियां, परिवार को अपना माना है। मैं आत्मा हूं। मन, बुद्धि, इन्द्रियों के पार मात्र अपने को जानो। अपने में स्थित रहने का पुरुषार्थ करो।
इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्री आचारांग सूत्र का स्वाध्याय करते हुए फरमाया कि एक ओर सैद्धांतिक चर्चा है तो दूसरी तरफ प्रयोग है। सिद्धांत की चर्चा स्वाध्याय में आती है। प्रयोग ध्यान और कायोत्सर्ग में आता है। श्री आचारांग का दूसरा नाम ही सामायिक है। सामायिक में केन्द्र बिन्दू आत्मा है।
उन्होंने आगे फरमाया कि साधक अपने संस्कारों के निमित्त से रूचि के अनुसार माला, स्वाध्याय करता है, किंतु भगवान का सीधा उद्बोधन जीवाजीव और उसके भेद के साथ होता है। साधना शिविर में भी जीवाजीव की चर्चा होती है, जिससे साधक ज्यादा से ज्यादा आत्मा का पोषण करते हुए आत्म ध्यान साधना की गहराई में पहुंच सके।
उन्होंने आगे धु्रवचारिणी की चर्चा करते हुए फरमाया कि आत्मा ध्रुवचारी है। धु्रवचारी का अर्थ सदा के लिए है। आत्मा धु्रव है जो सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक चारित्र से युक्त है।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘कोई गा न सके, पार पा न सके’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन फरमाया कि साधक जब दो घड़ी की सामायिक करते हैं और जब दो घड़ी की सामायिक पूर्ण हो जाती है तो शेष दिनभर का समय साधक के पास रहता है। यदि साधक सामायिक के अलावा शेष समय में लाभ-हानि, जन्म-मरण, निंदा-अपमान, मान-सम्मान की स्थिति में सम रहता तो उसका जीवन सामायिक पूर्ण होता है।
आज इन्दौर, नाशिक, बार्शी, नवसारी से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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