श्रोता गुणवान होना चाहिए |

9 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि सुनकर के ही व्यक्ति कल्याण के मार्ग को जानता है, पाप के मार्ग को जानता है। ग्रहण करने योग्य क्या है? छोड़ने योग्य क्या है यह सभी सुनकर ही व्यक्ति जान पाता है।

उन्होंने श्रोता के गुणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि श्रोता धर्म की परीक्षा करने वाल हो, नरक निगोद के दुःख से डरने वाला, स्वर्ग व मोक्ष के सुख को मानने वाला, बुद्धिमान हो, धर्म की बात सुनकर धारण करने वाला, छोड़ने व ग्रहण करने योग्य बातों को जानने वाला, निश्चय-व्यवहार ज्ञाता हो, विनयवान हो, दृढ़ श्रद्धालु हो, अवसर कुशल हो, निर्विचिकित्सी हो, जिज्ञासु हो, रस-ग्राही हो, इहलौकिक व परलौकिक सुखों की इच्छा करने वाला न हो, सुखदाता, प्रसन्नकारी, निर्णयकारी, प्रकाशक एवं गुण ग्राहक होना चाहिए।

उन्होंने फरमाया कि वेद उपनिषद का भी वाणी श्रवण के आधार पर निर्माण हुआ जैसे एक गुरु ने शिष्य को कहा आगे से आगे वह वाणी प्रसारित होती गई। भगवान महावीर ने जो कहा वह आगे सुधर्मा स्वामी, जम्बू स्वामी तक वाणी आई। बुद्ध ने आनन्द को कहा आगे धम्मपद के रूप में बात चलती रही है। सुनना महत्त्वपूर्ण है और सारगर्भित बात सुननी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति निरर्थक सुनता तो उसका कोई मूल्य नहीं हो सकता, उसको छोड़ देना चाहिए।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में नाम कर्म बंध की चर्चा करते हुए फरमाया कि जैसे कोई चित्रकार चित्र बनाता है उसमें रंग भरता है उसी प्रकार नाम कर्म बंधन के आधार पर शरीर का निर्माण होता है। व्यक्ति व्यर्थ ही शरीर को लेकर चिंतित रहता है और आर्त्त रौद्र का ध्यान

करता है विभाव में जाता हैं, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए अपने अगले जन्म को अच्छा बनाने के लिए उसे अपनी आत्मा का ही ध्यान करना चाहिए।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘किसी काम जो आये उसे इंसान कहते हैं, पराया दर्द अपनाये उसे इन्सान कहते हैं’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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