श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आनन्द श्रावक के प्रसंग का उल्लेख करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि आनन्द श्रावक प्रतिष्ठित श्रावक था, वैभवशाली आनंद अपनी साधना में लीन हो गया, वह अनुभव कर रहा है कि अभी त्रुटियां हैं। कहीं साधना में अभाव है। चौदह वर्ष की निरंतर साधना में उसने देखा कि जिस विधि से उसने व्रत ग्रहण किए हैं, उस विधि से उसका पालन नहीं हो सका। किसी व्रत, नियम, प्रतिज्ञा के न पालन होने के दो कारण होते हैं। एक कारण है: अपनी दुर्बलता। दूसरा है बाहर की परिस्थितियां। उसने विचार किया कि मेरे अंदर कोई दौर्बल्य नहीं है। मैं अंतरंग से दृढ़ हूं। मेरी आस्था, मेरी श्रद्धा सुदृढ़ है। मुझे भगवान महावीर की वाणी पर विश्वास है कि यह मार्ग सच्चा है, यथार्थ है, यही मार्ग आत्मा का कल्याण कर सकता है। मैंने व्रत भी ग्रहण किए हैं, किन्तु उसके पालने में शिथिलता है। उसके पालन में मेरी दुर्बलता हेतु नहीं है। वातावरण, परिस्थितियां मेरे अनुकूल नहीं हैं।
आनंद ने विचार किया कि मेरी प्रतिकूलता कहां से हैं? उसने सोचा साधना में बाधा और विक्षेप बाहर से आता है। वह बड़ा आदमी है। उसका ऐश्वर्य-वैभव बहुत है। कोल्लाक सन्निवेश के बहुत से लोग उससे राय लेने आते हैं। मार्गदर्शन लेते हैं। वह कोल्लाक सन्निवेश का बड़ा और बुद्धिमान व्यक्तित्व समझा जाता था। आनंद शोर नहीं मचाता, वह प्रदर्शन नहीं करता, न वह दूसरों को देखता है। वह अपने आपको देखता है और अन्तर्दृष्टि होकर अपने जीवन को निहारता है। उसे लगा कि कहीं त्रुटियां हैं। लोगों की दृष्टि में बड़ा हूं किन्तु यह जो परोपकार, लोकेषणा का मार्ग है, यह मेरी साधना में बाधक बन रहा है। मुझे आत्म-साधना के लिए समय नहीं मिलता। आनंद सांसारिक दायित्वों से मुक्त हो गया। कोल्लाक सन्निवेश में ज्ञातकुल की एक प्राचीन पौषधशाला आनंद चला गया। उसने घर छोड़कर पुत्र को दायित्व संभाल दिए। पौषधशाला में जाकर कुशा का आसन बिछाया। उस पर वह आरूढ़ हो गया। उसने पौषध ग्रहण कर लिया। किन्तु पौषध एक दिन का होता है। फिर क्या करना है? उसने विचार किया-बारह व्रतों से आगे प्रतिमाएं भी हैं। एक श्रावक बारहव्रती है, एक प्रतिमाधारी श्रावक होता है। उसने विचार किया कि प्रतिमाधारी श्रावक की साधना बारहव्रती श्रावक की साधना से बहुत आगे है, ऊपर है।
उन्होंने फरमाया कि निष्काम भाव से परोपकार का मार्ग पुण्य का मार्ग है। अपने व्यक्तित्व के लिए नेतागिरी की जाए तो यह पाप का मार्ग है। यह कर्मबंधन का मार्ग है। यदि कोई निष्काम और निःस्वार्थ भाव से किसी का नेतृत्व करता है, ठीक राय देता है, अवलंबन बनता है, जैन धर्म की दृष्टि से अधिक से अधिक पुण्य हो सकता है, किंतु यह कल्याण का मार्ग नहीं है। जैन श्रर्म ने दो बातें कही हैं-पुण्य और धर्म। जैन धर्म के अनुसार पुण्य एक कर्म है। जैसे पाप एक कर्म है, ऐसे पुण्य कर्म हैं। पाप कर्म का फल दुःख है, पुण्य कर्म का फल सुख है, पर शांति नहीं। शांति धर्म से मिलती है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने सामायिक में लगने वाले अतिचारों से बचने प्रेरणा देते हुए फरमाया कि सामायिक व्रत के लिए मन, वचन, काया से शरीर को सावधान रखने की आवश्यकता रहती है, किंतु जब ये तीनों सावधान नहीं रहते तो सामायिक का जो फल मिलना चाहिए वह मिल नहीं पाता। इन तीनों दोषों को अतिचारों में गर्भित किया गया है व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार है। सामायिक में इतनी शक्ति है कि यदि शुद्ध रूप से वीतराग सामायिक की जाए, जिसमें न राग न द्वेष मन, वचन, काया से पार जाकर आत्मा को आत्मा में स्थित कर लें, बिना किसी अतिक्रम के तो केवल ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ईश्वर से करते जाना प्यार ओ नादान मुसाफिर, नैय्या को करते जाना पार ओ नादान मुसाफिर’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज श्री वर्धमान स्थानक जैन महासंघ चैन्नई के अध्यक्ष श्री सुरेश लूणावत गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन द्वारा स्वागत सम्मान किया गया
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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